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Updated: 17 hours 25 min ago

माह वार करें सब्जियों की खेती

Sun, 10/22/2017 - 05:10

संबंधित महीनों में उगाई जाने वाली सब्जियों का विवरण निम्‍नानुसार है :
माह फसलें
जनवरी
राजमा, शिमला मिर्च, मूली, पालक, बैंगन, चप्‍पन कद्दू
फरवरी
राजमा, शिमला मिर्च, खीरा-ककड़ी, लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, खरबूजा, तरबूज, पालक, फूलगोभी, बैंगन, भिण्‍डी, अरबी, एस्‍पेरेगस, ग्‍वार
मार्च
ग्‍वार, खीरा-ककड़ी, लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, खरबूजा, तरबूज, पालक, भिण्‍डी, अरबी
अप्रैल
चौलाई, मूली
मई 
फूलगोभी, बैंगन, प्‍याज, मूली, मिर्च
जून 
फूलगोभी, खीरा-ककड़ी, लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, बीन, भिण्‍डी, टमाटर, प्‍याज, चौलाई, शरीफा
जुलाई
खीरा-ककड़ी-लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, भिण्‍डी, टमाटर, चौलाई, मूली
अगस्‍त
गाजर, शलगम, फूलगोभी, बीन, टमाटर, काली सरसों के बीज, पालक, धनिया, ब्रसल्‍स स्‍प्राउट, चौलाई
सितम्‍बर
गाजर, शलगम, फूलगोभी, आलू, टमाटर, काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्‍ता गोभी, कोहीराबी, धनिया, सौंफ के बीज, सलाद, ब्रोकोली
अक्‍तूबर
गाजर, शलगम, फूलगोभी, आलू, टमाटर, काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्‍ता गोभी, कोहीराबी, धनिया, सौंफ के बीज, राजमा, मटर, ब्रोकोली, सलाद, बैंगन, हरी प्‍याज, ब्रसल्‍स स्‍प्राउट, लहसुन
नवम्‍बर
चुकन्‍दर, शलगम, फूलगोभी, टमाटर, काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्‍ता गोभी, शिमला मिर्च, लहसुन, प्‍याज, मटर, धनिया
दिसम्‍बर
टमाटर, काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्‍ता गोभी, सलाद, बैंगन, प्‍याज

Category: खेती

मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यों और कैसे ?

Sat, 10/21/2017 - 05:00

मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यों और कैसे ? क्यूंकि ,मुर्गीपालन भूमिहीन ,सीमान्त किसानों तथा बेरोजगार नौजवानों को स्वरोजगार उपलब्ध कराने का एक प्रभावी साधन है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गीपालन लगातार ८-१० प्रतिशत वार्षिक वृद्धि की दर से बढ़ रहा है जबकि दूध व्यवसाय की वार्षिक वृद्धि दर ४-५ प्रतिशत अनुमानित है । कुछ प्रबुद्ध शाकाहारियों द्वारा अनिषेचित अंडे को शाकाहार के रूप में स्वीकार किये जाने से अंडे की माँग में राष्ट्रीय स्तर पर वृद्धि हुई है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि इस व्यवसाय में कम कीमत पर अधिक खाद्य पदार्थ प्राप्त होता है । उदाहरण के रूप में ब्रायलर मुर्गे का एक किग्रा शरीर भार २ किग्रा दाना मिश्रण खिला कर प्राप्त किया जा सकता है । इसी प्रकार मुर्गी से एक दर्जन अंडे पाने के लिये उसे सिर्फ़ २.२ किग्रा दाना मिश्रण ही खिलाना जरूरी होता है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गी की खाद्य परिवर्तन क्षमता गाय और सूअर की तुलना में भी बहुत बेहतर होती है । गाय एक किग्रा खाद्य पदार्थ उत्पादन के लिये ५ किग्रा दाना मिश्रण तथा सूअर एक किग्रा मांस उत्पादन के लिये ३ किग्रा दाना मिश्रण का उपयोग करता है जबकि मुर्गी सिर्फ़ दो किग्रा दाना खा कर एक किग्रा शरीर भार पा लेती है ।

मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गी के माँस के विक्रय में किसी भी प्रकार की धार्मिक मान्यता बाधक नहीं बनती है. साथ ही साथ मुर्गी के माँस तथा अंडे के लिये अपने प्रदेश तथा पूरे देश में भलीभाँति विकसित बाजार मौजूद है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गी की बीट तथा बिछावन से बनाई गयी खाद में , गाय के गोबर की खाद की तुलना में अधिक मात्रा में नत्रजन, फास्फोरस तथा पोटाश पाया जाने के कारण इसकी कार्बनिक खेती के लिये बहुत माँग रहती है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गी की सुखाई हुई बीट को निर्जमीकृत करने के बाद पशु आहार बंनाने में भी प्रयोग किया जाता है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गी के अंडे के अंड पीत को वीर्य तानुकारक बनाने में भी प्रयोग किया जाता है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गी का व्यवसाय एक ऐसा अनूठा धंधा है जिसमें बहुत ही जल्दी आपकी पूँजी बढोत्तरी के साथ आपको वापस मिल जाती है । ब्रायलर मुर्गे से सिर्फ़ ४ सप्ताह में आप एक किग्रा वजन पा सकते हैं ।

इसी प्रकार मुर्गी से अंडा उत्पादन प्राप्त करने के लिये लगभग ४.५ महीने का समय पर्याप्त होता है ।इस प्रकार पूँजी को लाभ सहित वापस पाने के बाद उसे फिर से इस व्यवसाय में लगाने से अगली बार और अधिक पूंजीगत लाभ की प्राप्ति सम्भव हो पाती है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गीपालन में तुलनात्मक रूप से कम पूँजी, कम स्थान तथा कम श्रम शक्ति की जरूरत पडती है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गी के व्यवसाय से सारे साल नियमित रूप से आय प्राप्ति सम्भव है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गी पालन के धंधे का विस्तार भी बहुत आसान है क्योंकि एक अच्छी नस्ल की उन्नत मुर्गी साल भार में २५० से अधिक निषेचित अंडे देने की क्षमता रखती है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि यदि वैज्ञानिक तरीके अपनाते हुए तथा नियमित रूप से टीकाकरण करने के साथ मुर्गीपालन किया जाये तो इस व्यवसाय में जोखिम भी बहुत कम रहता है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गीपालन को स्वरोजगार के रूप में बेरोजगार नौजवान, गृहणी तथा सेवानिवृत्त कर्मचारी, भी सहजता से अपना कर एक अतिरिक्त आय का स्रोत बना सकते हैं ।

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Category: खेती

ग्रीन हाउस किसानो के लिए वरदान

Thu, 10/19/2017 - 07:09

ग्रीन हाउस के माध्यम से किसान कम लागत में अपने सपनों को नई उडान दे सकते है | ग्रीन हाउस कि तकनीक काफी किफायती है | कम जगह में अच्छी फसल देना इसकी खूबी है | ग्रीन हाउस में बहुत अधिक गर्मी है या सर्दी से फसलों कि रक्षा करते है,धुल और बर्फ के तूफानों से पौधों कि ढाल बनते है और किटों को बाहर रखने में मदद करते है,प्रकाश और तापमान नियंत्रण कि वजह से ग्रीन हाउस कृषि के अयोग्य भूमि को कृषि योग्य भूमि में बदल देता है | यह तकनीक पौधों को प्रतिकूल दशाओं के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करती है | कृषि से सम्बन्ध रखने वाले युवा जो पहले खेती करना छोड़कर नौकरी के लिए शहर कि तरफ जाने लगे थे | वो अब ग्रीन हाउस कि नई तकनीकें सीखकर गांव को लौट रहे है | ग्रीन हाउस में डच गुलाब,जरबेरा कारनेशन गुलदावदी रंगीन शिमला मिर्च,चेरी,टमाटर एफ-1 हाईब्रिड टमाटर कि खेती कर सकते है | ग्रीन हाउस लोहे के पाइपों या लकड़ी से बना एक ऐसा ढाचा है जो एक पारदर्शी आवरण से ढंका होता है | इसमे से सूर्य कि किरणे जो पौधों के लिए उपयुक्त पाई जाती है , अंदर आ सकती है | विशेष तौर से 400-700 नैनोमीटर वेवलेंथ वाली किरणे जिसको कि हम विजिबल लाईट कहते है | पौधों कि प्रकाश संश्लेषण क्रिया के लिए उपयुक्त होती है | अगर यह पारदर्शी ढंकने कि सामग्री पोलीथीन फिल्म या शीट काम में ली जाती है तो इसे पोलीहाउस कहते है | पोलिहाऊस में कटफ्लावर कि खेती (डच गुलाब ,जरबेरा कारनेशन,गुलदावदी और रंगीन शिमला मिर्च) कि खेती कि जाती है | अगर यह पारदर्शी ढकने कि सामग्री शेड नेट कि जाली है तो उसे शेडनेट हाउस कहा जाता है |शेडनेट हाउस में रंगीन शिमला मिर्च चेरी,टमाटर जुकनी ब्रोकली लेट्यूस लाल गोभी हरा धनिया और सब्जियों के पौध ,फलों के पौधे एवं जंगली पौधों कि नर्सरी तैयार करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है | अगर यह पारदर्शी ढकने कि सामग्री में ग्लास है तो उसे ग्लास हाउस कहते है | एक अच्छे ग्रीन हाउस के लिए 4000 वर्ग मीटर कि जगह पर्याप्त है क्योकिं ऐसे ग्रीन हाउस में हवा का प्रवाह ठीक रहता है | तापमान आर्दता आदि को नियंत्रित करना आसान होता है ,उत्पाद व गुणवत्ता कि मात्रा भी अच्छी होती है | पोलीहाउस लगाने पर 935 रु. वर्ग मीटर का खर्चा आता है जबकि छाया गृह लगाने पर 270 रु.वर्ग मीटर का खर्च आता है | ग्रीन हाउस से कि जाने वाली खेती ,खेती नहीं बल्कि एक उद्योग है | इसी वजह से युवा वर्ग इसे स्वरोजगार के रूप में अपनाकर अच्छा मुनाफा कमा रहे है | एक ग्रीन हाउस से सामान्यत: 10 से  15 हजार रुपये तक आसानी से कमा सकते है | नीदरलैंड से ले प्रेरणा – नीदरलैंड में 9000 के आस – पास ग्रीनहाउस 10,000 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन प् लगे हुए है जिससे लगभग 150,000 श्रमिकों को रोजगार मिला हुआ है जो श्रमिकों को रोजगार मिला हुआ है जो कुशलतापूर्वक 4.5 अरब यूरो कीमत की सब्जियां फल,पौधे और फूल उगा रहे है जिसमे से 80 प्रतिशत हिस्से का निर्यात किया जाता है | कहां से ले प्रशिक्षण ? 1.       इन्टरनेशनल होर्टिकल्चर इनोवेशन एण्ड ट्रेनिंग सेन्टर दुर्गापुरा ,जयपुर(राजस्थान) 2.       हार्टिकल्चर ट्रेनिंग सेन्टर,तालेगांव दाभाडे पूना(महाराष्ट्र) 3.       इंटरनेशनल इंस्टीटयूट ऑफ हार्टिकल्चर टेक्नोलॉजी नोएडा (यू.पी.) 4.       इण्डियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट नई दिल्ली 5.       सेन्ट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ टेम्परेट हार्टिकल्चर श्री नगर,(जे एण्ड के ) 6.       डॉ.यशवन्त परमार हार्टिकल्चर युनिवर्सिटी सोलन(हिमालय प्रदेश) 7.       इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ 

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Category: खेती

उपजाऊ मिट्टी नासमझी और मनमानी से बन रही जहर

Wed, 10/18/2017 - 05:09

इटारसी। सोना उगलने वाले होशंगाबाद जिले की उपजाऊ मिट्टी किसानों की नासमझी और मनमानी की वजह से जहर में तब्दील होती जा रही है। बंपर पैदावार के मामले में पंजाब जैसे कृषि प्रधान प्रदेश को पीछे छोड़ने वाले जिले में कीटनाशक दवाओं के अंधाधुध प्रयोग से मिट्टी में मौजूद आर्गेनिक तत्वों का असंतुलन बढ़ता जा रहा है। इससे जहां पैदावार प्रभावित हो रही है वहीं रासायनिक तत्वों से पैदा अनाज के सेवन से मानव शरीर को नुकसान पहुंचने का खतरा भी बढ़ रहा है। निकट भविष्य में रासायनिक खेती के गंभीर दुष्परिणाम किसानों को भुगतना पड़ सकते हैं।

किसानों को नहीं परवाह

अधिकतम उत्पादन और जल्दी फसल तैयार करने के लालच में किसानों ने अंधाधुध तरीके से कीटनाशक दवाएं खेतों में डालना शुरू किया है। इससे तात्कालिक लाभ तो मिल रहा है लेकिन खेतों की मिट्टी में अम्लीयता बढ़ रही है। इससे निकट भविष्य में न केवल उत्पादन प्रभावित होगा, बल्कि उत्पादित अनाज के सेवन से मानव शरीर को भी नुकसान होने की आशंका है। कीटनाशकों के मामले में जिले के किसान वैज्ञानिकों की सलाह लिए बिना मनमर्जी से इसका उपयोग कर रहे हैं। पोषक एवं उर्वरक तत्वों की कमी होने के कारण किसानों ने अपने खेतों को जहरीला बना लिया है।

मृदा परीक्षण की चिंता नहीं

किसानों की सुविधा के लिए कृषि विभाग द्वारा पवारखेड़ा में मृदा परीक्षण प्रयोगशाला संचालित की जा रही है। जहां मात्र पांच रूपए में खेतों की मिट्टी का सैंपल लेकर जांच की जाती है, लेकिन हजारों एकड़ रकबे वाले जिले में सालाना लगभग दस हजार किसान ही मृदा परीक्षण के लिए आते हैं। वैज्ञानिकों के बुलावे के बाद भी किसान इसमें रूचि नहीं ले रहे हैं। केन्द्र से किसानों को कई महत्वपूर्ण जानकारियां भी निशुल्क दी जाती हैं।

पंजाब भुगत रहा नुकसान

दो दशक पहले तक पंजाब-हरियाणा की उपजाऊ जमीन भी कीटनाशक दवाओं के बेतहाशा उपयोग का खामियाजा भुगत रही है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार अब हालात यह हैं कि पंजाब की जमीन धीरे-धीरे बंजर हो गई है। यहां तेजी से उत्पादन क्षमता में गिरावट आई है।

जैविक कृषि से परहेज

एक दौर में जैविक तत्वों, गोबर गैस एवं घरेलू उपायों से खेती करने वाले किसान अब जैविक खेती से परहेज करने लगे हैं। कृषि क्षेत्र में बढ़ी प्रतिस्पर्धा इसका बड़ा कारण है। प्राचीन भारत की कृषि पद्घति ऋ षि खेती भी किसान भूल चुके हैं। जिसमें पूरी तरह जैविक पदार्थो का उपयोग किया जाता रहा।

अंतर्राष्ट्रीय मानकों की अनदेखी

वैज्ञानिकों के अनुसार कीटनाशक दवाओं के उपयोग को लेकर अंतर्राष्ट्रीय मानक निर्धारित किए गए हैं। इसके मुताबिक ही कीटनाशक दवाओं का छिड़काव होना चाहिए लेकिन नियमों के विपरीत कीटनाशकों के उपयोग से मिट्टी में मौजूद प्राकृतिक केंचुए, कीट-पतंगे एवं आर्गेनिक नष्ट हो रहे हैं।

क्या है मिट्टी का फार्मूला

बेहतर एवं संतुलित कृषि उत्पादन के लिए आदर्श मिट्टी में पीएच-7 का फार्मूला अपनाया जाता है। इसमें सभी जरूरी तत्वों का संतुलन शामिल है। इससे कम या ज्यादा की मिट्टी आदर्श नहीं मानी जाती। जिले में हो रहे परीक्षण में पता चला है कि अधिकांश खेतों की मिट्टी पीएच-7 के अनुरूप नहीं है। मिट्टी में जरूरी तत्वों की कमी के अलावा अम्ल की मात्रा बढ़ रही है। मिट्टी में कुल सोलह जरूरी तत्व होते हैं।

जैविक

इन तत्वों का अंसतुलन

जांच रिपोर्ट के अनुसार खेतों की मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी आ रही है। आदर्श तौर पर यह मात्रा 180-200 प्रति किलो-हेक्टेयर होना चाहिए। इसके अलावा मिट्टी में जिंक की कमी भी आ रही है। धान के लिए जिंक संतुलन जरूरी है। इसकी कमी से धान के पौधे में चकते पड़ने लगे हैं। फॉस्फोरस भी मध्यम स्तर पर आ गया है। इसके अलावा पोटेशियम, कॉपर, मोलीविडेनम, सोडियम, मैग्नीज, आयरन भी तेजी से बढ़ रहा है। पोटेशियम(220ः300) से बढ़कर 500 की सीमा लांघ चुका है।

ये है नुकसान

पोटेशियम की बढ़त- दाने की चमक खत्म, फसल में रोग प्रतिरोधकता की कमी।

जिंक की कमी- पौधों का बीमार होकर पैदावार पर असर।

नाइट्रोजन की कमी- आर्गेनिक तत्वों की कमी से उत्पादन एवं फसल प्रभावित।

फॉस्फोरस की कमी- जड़ों का विकास रूकना।

चिंताजनक है स्थिति

कीटनाशक दवाओं का मनमर्जी से उपयोग करने की वजह से मिट्टी में पाए जाने वाले आर्गेनिक तत्वों को नुकसान हो रहा है। इससे फसलों के उत्पादन पर असर पड़ रहा है। संभाग के किसान मृदा परीक्षण में भी रूचि नहीं लेते हैं। कई हानिकारक तत्वों की मात्रा बढ़ने से खेत जहरीले होते जा रहे हैं। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। निकट भविष्य में किसानों को इसके गंभीर परिणाम भुगतना पड़ सकते हैं।

जीएस बेले, सहायक मृदा परीक्षण अधिकारी

मृदा परीक्षण केन्द्र पवारखेड़ा।

फसलों में उपयोग होने वाले रासायनिक तत्व अनाज के जरिए शरीर में प्रवेश करते हैं। इससे हार्टअटैक, त्वचा संबंधी रोग, रक्तचाप, शुगर सहित अन्य घातक बीमारियां हो सकती हैं। तेजी से बढ़ रही बीमारियों का एक बड़ा कारण यह भी है।

डॉ. केएल जैसवानी, वरिष्ठ चिकित्सक।

जागरूकता अभियान चलाएंगे

रासायनिक खेती की जगह किसानों को जैविक कृषि करने के लिए जागरूक किया जा रहा है। इसके लिए वर्मी कंपोस्ट, नाडेप, बॉयोगैस प्लांट के साथ नीम का तेल, बेश्रम, तंबाखू की पत्तियों को निचोड़कर खेतों में छिड़काव करने की सलाह दी जा रही है। जिसे पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे।

पीके विश्वकर्मा, संयुक्त संचालक कृषि विभाग। 

Category: खेती

ऐसे बनाए ऊसर भूमि को उपजाऊ

Wed, 10/18/2017 - 05:08

ऊसर सुधार का कार्यक्रम जून में ही शुरु कर देना चाहिए। ऊसर सुधार करने से पहले अपने स्थानीय ग्राम, खंड अथवा जिला विकास अधिकारी से संपर्क कर ऊसर सुधार संबंधी योजना/परियोजना, अनुदान और प्रशिक्षण कैम्पों की जानकारी ले लें। ऊसर सुधार के लिए कुछ महत्वपूर्ण चरण हैं।

मिट्टी की जांच : पीएच मान और खेती की क्षमता मिलकर तय कर देते हैं कि ऊसर भूमि किस श्रेणी की है और उसमें कितनी और कैसी फसल होगी। मिट्टी की जांच के नतीजे से मिट्टी की श्रेणी जान सकते हैं। यह जानने के बाद ही कर पाएंगे कि अपने ऊसर जमीन के सुधार के लिए कितने जिप्सम की आवश्यकता पड़ेगी। अतः सबसे मिट्टी जांच कराएं।

मेड़बंदी : अच्छी-मजबूत मेड़ किसी भी खेत में नमी को टिकाए रखने, अनुशासित सिंचाई तथा अतिक्रमण से बचाए रखने की सबसे पहली शर्त है तो ऊसर सुधार सबसे पहला और जरूरी काम। न्यूनतम डेढ़ फीट ऊंची मेड़ तो होनी ही चाहिए। इसके लिए भूमि सुधार, ऊसर सुधार और बंजर भूमि विकास संबंधी योजना-परियोजनाओं का लाभ लिया जा सकता है। 

स्क्रेपिंग : मिट्टी की ऊपरी और निचली परतों में से नमक को पूरी तरह हटाए बगैर ऊसर भूमि को उपजाऊ नहीं बनाया जा सकता। ‘स्क्रेपिंग’ मिट्टी की ऊपरी परत में उभर आए नमक को पूरी तरह हटाने का काम है। सावधानी बरतें कि इस तरह हटाए नमक को खेत से बाहर किसी गड्ढे में डालें अथवा किसी नाले में बहा दें। ऐसी जगह कतई न डालें कि बारिश के दौरान वह वापस खेत में आ जाए।

सब-प्लाटिंग : सब प्लाटिंग का मतलब होता है, खेत को छोटी-छोटी क्यारियों में बांट लेना। यह तीसरा महत्वपूर्ण कदम है। ऐसा करना समतलीकरण और आगे की प्रक्रिया में मददगार सिद्ध होता है।

समतलीकरण : खेत का समतलीकरण सबसे जरूरी काम है। इसे पूरी संजीदगी और कुशलता से किया जाना चाहिए। 

यदि खेत समतल नहीं होगा तो खेत में डाला जाने वाला जिप्सम किसी एक जगह इकट्ठा हो जाएगा। पूरे खेत में एक समान जिप्सम नहीं फैलने से असर भी एक समान होगा, जोकि अनुचित है।

खेत-नाली : समतल हो गए खेत में ढाल की ओर अथवा खेत के बीचो-बीच खेत नाली बनाएं। खेत नाली का उपयोग जल निकासी के लिए किया जाता है।

फ्लंसिंग : फ्लंसिंग वह प्रक्रिया है, जिसमें ऊसरीली जमीन को 15 सेंमी ऊंचा पानी भर देते हैं। 48 घंटे बाद जब पानी को बहाया जाता है, तो इसके साथ-साथ नुकसानदेह लवण भी पानी में घुलकर बह जाता है।

फ्लंसिंग और स्क्रेपिंग: याद रहे कि यह दोनों प्रक्रिया मिट्टी की निचली और ऊपरी सतह में मौजूद लवण को निकाल बाहर करने के लिए हैं। इन्हें आधा-अधूरा नहीं करना चाहिए।

जिप्सम मिक्सिंग : फ्लसिंग के बाद नंबर आता है ऊसर को उर्वरक बनाने वाली जिप्सम को मिट्टी में मिलाने का। जिप्सम सस्ता, लेकिन ऊसर सुधार के लिए सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। इसे किसी भी मात्रा में या अधिक से अधिक मात्रा में नहीं मिलाना चाहिए। किस श्रेणी में पोषक तत्व की कितनी मात्रा कम है, उसके अनुसार जिप्सम की मात्रा तय की गई है। 

लीचिंग : मिट्टी में जिप्सम को भली प्रकार से मिला देने के बाद जून के दूसरे पखवाड़े में खेत को एक बार फिर 10-12 सेमी ऊंचे पानी से भर दें। 10 से 12 दिन बाद बचे हुए पानी को निकाल दें। इस प्रक्रिया को ‘लीचिंग’ कहते हैं।

खेत सुधार : लीचिंग के बाद यूं तो आपका खेत धान की खेती के लिए तैयार होगा, किंतु यदि आप खेत को हरी, देसी, नाडेप अथवा केंचुआ खाद दे सकें तो सोने में सुहागा हो जाएगा। ध्यान रहे कि धान रोपाई को समय से तैयार करें और उचित समय आने पर रोप दें। उचित बीज का चयन, खेती का वैज्ञानिक तरीका, कीट सुरक्षा और उचित तकनीक का उपयोग करें तो उपज बेहतर होने की संभावना बढ़ जाएगी।

ऊसर भूमि में कर सकते हैं धान की खेती

धान की नरेन्द्र ऊसर धान-2, साकेत-4, सी.एस.आर.-10, मोजा-349 जैसी कुछ किस्में हैं, जो ऊसर के लिए उपयुक्त होती है। खरीफ की फसलें क्षारीयता को सह लेती हैं। धान की फसल भी क्षारीयता के प्रति सहनशील होती है इसलिए ऊसरीली भूमि में दो-तीन वर्षों तक खरीफ में सिर्फ धान की फसल लेनी चाहिए। ऐसा करने से जैविक क्रिया के फलस्वरूप एक प्रकार का कार्बनिक अम्ल बनता है जो क्षारीयता को कम करता है। साथ ही भूमि में सोडियम तत्व का अवशोषण अधिक मात्रा में होने से भूमि में विनिमयशील सोडियम की मात्रा कम हो जाती है।

Category: खेती

खेती में गाय और केंचुए को लेकर चल रही है खींचतान

Mon, 10/16/2017 - 07:07

कपड़े का मशहूर ब्रांड गैप समाज और कारोबार में बढ़त पाने की खातिर गोबर पर आधारित प्राकृतिक खेती का समर्थन कर रहा है। यही वजह है कि भारत में गायों की संख्या कम होने से गैप चिंतित है।

इस ब्रांड का ऑर्गेनिक फार्मिंग यानी जैविक खेती के समर्थकों से वैचारिक टकराव चल रहा है। कंपनी का मानना है कि अगर उसे अपने ब्रांड के लिए समाज में एक निश्चित मुकाम दिलानी है तो इसका सबसे बढ़िया तरीका है कि प्राकृतिक खेती का समर्थन किया जाए। इस तरह की खेती के लिए गाय का गोबर और गोमूत्र बहुत ही जरूरी तत्त्व हैं।

उत्तर भारत में भैंस के दूध की ज्यादा कीमत मिलने से और जैविक खाद के लिए सब्सिडी के अभाव ने देश के उत्तरी इलाकों में गायों की आबादी को घटाने में बड़ी भूमिका निभाई है। गैप को उम्मीद है कि उसे पर्याप्त संख्या में गायें मिल जाएंगी और भविष्य के ब्रांड की खातिर उसके कपास के किसानों को गोबर वाली खाद मिल जाएगी।

इसका कहना है कि कर्ज के बोझ और उर्वरक की ऊंची लागत की वजह से आत्महत्या के लिए मजबूर होने वाले कपास किसानों को राहत पहुंचाना उसका मुख्य मकसद है। गैप की ग्लोबल पार्टनरशिप डायरेक्टर लक्ष्मी मेनन भाटिया कहती हैं - जीरो बजट फार्मिंग के जरिये कपास उगाने में मदद देकर हम इसे रोकना चाहते हैं, ऐसी खेती के लिए मुख्य इनपुट गाय के गोबर से बनी खाद होगी।

पिछले महीने कंपनी को प्राकृतिक खेती के गुरु सुभाष पालेकर की सेवाएं मिलीं। पालेकर जीवमूत्र या गाय के गोबर से बनी खाद के इस्तेमाल की बाबत सैकड़ों किसानों को शिक्षित करेंगे। उनका कहना है कि गाय जितनी कम उर्वर होगी, उसके गोबर से बनने वाली खाद उतनी ही बेहतर होगी।

काफी सहज तरीके से वह कहते हैं कि हमारे तौर-तरीके से मिश्रण तैयार कर पौधों में डाल दिया जाए और उसे प्राकृतिक तरीके से बढ़ने दिया जाए, जैसा कि वे जंगल में बिना सिंचाई व बिना खाद के ऐसा करते हैं। लेकिन विदर्भ के किसानों का कहना है कि यह उतना आसान या सस्ता नहीं है, जैसा कि लगता है।

विदर्भ के किसान नेता विजय जयवंतिया कहते हैं - पालेकर से पूछिए कि अमरावती इलाके में प्राकृतिक खेती मशहूर क्यों नहीं है? जयवंतिया का कहना है कि एक ओर जहां रासायनिक उवर्रक के लिए सब्सिडी मुहैया कराई जाती है, वहीं दूसरी ओर गाय पालने या चारे के लिए सब्सिडी सरकार नहीं देती। इसके अलावा इसमें श्रमिक की दरकार होती है जो कि खर्चीला है।

फिलहाल गैप भारत सरकार से गठजोड़ करने के मसले पर काम कर रहा है और ग्रामीण विकास जैसे मंत्रालय को इसमें शामिल किया है ताकि मंत्रालय किसानों को प्राकृतिक खेती के विकल्प अपनाने के लिए दबाव डाल सके। गैप दूसरे ब्रांड से समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन इस कहानी में एक उलझन भी है।

प्राकृतिक खेती के पालेकर जैसे अगुआ जैविक खेती के समर्थन में खड़े हैं, जो कि वैसे उर्वरक के जरिए किया जाता है जिसका निर्माण केंचुए करते हैं, ये केंचुए जैविक कूड़ा-करकट पर पलते हैं। इस मुद्दे पर आलोचना इस बात की होती है कि जैविक उर्वरक में ह्यूमस का अभाव होता है। ह्यूमस अवक्रमित जैविक पदार्थ है जो कि मिट्टी में मौजूद होता है। यह जमीन को उर्वरा बनाने में मदद करता है और नमी को बरकरार रखता है।

पालेकर कहते हैं कि केंचुए ह्यूमस के निर्माण को रोकते हैं। ये कैडमियम, आर्सेनिक, सीसे और पारे का सेवन करते हैं और कार्बन छोड़ते हैं जो कि जलवायु परिवर्तन के अलावा आपको कैंसर जैसी बीमारी भी देता है। जैविक व प्राकृतिक खेती पर वैश्विक स्तर पर बहस होती रही है। मुख्य विवाद यह है कि एक ओर जहां जैविक खेती में पौधों के लिए मानव के उपयोग की आवश्यकता पर जोर नहीं दिया जाता, वहीं ऐसा विचार प्राकृतिक खेती से केंद्र में होता है।

गोबर और गोमूत्र के इस्तेमाल से उर्वरक व कीटनाशक तैयार करने के साथ-साथ बीजों में सुधार के फॉर्मूले के बारे में पालेकर कई तरीके बताते हैं। उनका कहना है कि सिर्फ एक गाय 30 एकड़ जमीन को उर्वरा बना सकती है। कीड़ों के सामने फेंकने से पहले गाय केगोबर से ह्यूमस बनाया जा सकता है। जैविक खेती की आलोचना करने वाले कहते हैं - जैविक कचरे का सेवन करने वाले कीड़े ह्यूमस के निर्माण को रोक देते हैं।

ये कीड़े वहां मौजूद सभी कैडमियम, आर्सेनिक, सीसे और पारे खा जाते हैं और कार्बन उत्सर्जित करते हैं, जो जलवायु परिवर्तन में योगदान देता है। इसे खतरनाक बताते हुए वे कहते हैं कि उर्वरक में मौजूद कैडमियम केतत्त्व से कैंसर हो सकता है। लेकिन देविंदर शर्मा जैसे कृषि वैज्ञानिक देवेंदर शर्मा इसे खारिज करते हैं। पहले भी मिट्टी में स्वाभाविक रूप से केंचुए होते थे।

वे पूछते हैं कि क्या वे ह्यूमस को रोकते हैं? पालेकर यह अंतर निजी दृष्टिकोण से कर रहे हैं। उनका कहना है कि इसका कोई मतलब नहीं है और यह गलत है। गाय का गोबर और केंचुआ एक दूसरे के पूरक हैं। उनका कहना है कि जरूरत है वर्मिकंपोस्ट इंडस्ट्री को समाप्त करने की। हमें प्राकृतिक रूप से मौजूद केंचुए और गाय के गोबर पर निर्भर होना चाहिए, न कि हमें इन दोनों का एक दूसरे के खिलाफ उठने वाले विवादों में फंसना चाहिए।

हालांकि गैप ने फैसला किया है कि वह गाय के पक्ष में खड़ी होगी, न कि केंचुए के पक्ष में। पालेकर और उनके समर्थक भी गाय पर ही भरोसा कर रहे हैं, न कि आयातित दूसरे सामान पर। उनका कहना है कि सिर्फ एक गाय के जरिए 30 एकड़ जमीन उपजाऊ बन सकती है। एपेरेल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के जरिए गैप जल्दी ही आपूर्तिकर्ताओं तक पहुंचेगी और दूसरे ब्रांड तक भी।

ऑर्गेनिक उत्पाद को प्रमाणित करने वाली एजेंसी इकोसर्ट के मुताबिक, इस दौड़ में कीड़े काफी आगे हैं और साल 2007-08 में वैश्विक स्तर पर जैविक कपास के उत्पादन में 152 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। उत्पादन के मामले में भारत का स्थान सीरिया के बाद दूसरा है।

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गौपालन में रोग नियंत्रण

Sun, 10/15/2017 - 05:00

अ) संक्रामक रोगों से बचने के लिए नियमित टिके लगवाएं|

(आ) बाह्य परिजीवियों पर नियंत्रण रखे| संकर पशुओं में तो यह अत्यंत आवश्यक है|

(इ) आन्तरिक परजीवियों पर नियंत्रण रखने के लिए हर मौसम परिवर्तन पर आन्तरिक परजिविनाशक दवाएँ दें|

(ई) संकर गौ पशु, यदि चारा कम खा रहा है या उसने कम दूध दिया तो उस पर ध्यान देवें| संकर गाय देशी गाय की आदतों के विपरीत बीमारी में भी चारा खाती तथा जुगाली भी करती है|

(उ) थनैला रोग पर नियंत्रण रखने के लिए पशु कोठा साफ और हवादार होना चाहिए| उसमें कीचड़, गंदगी न हो तथा बदबू नहीं आना चाहिए| पशु के बैठने का स्थान समतल होना चाहिए तथा वहाँ गड्ढे, पत्थर आदि नुकीले पदार्थ नहीं होना चाहिए| थनैला रोग की चिकित्सा में लापरवाही नहीं बरतें|

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गाजर की उन्नत क़िस्में

Sat, 10/14/2017 - 04:06

गाजर की बहुत सी देशी तथा विदेशी किस्मे है जिनमे से कुछ प्रमुख किस्मे निम्नलिखित है।

पूसा केसर

पूसा केसर लाल रंग की होती हे जो गाजर की उत्तम प्रजाति है। इसकी पत्तियाँ छोटी तथा जड़ें लम्बी, आकर्षक लाल रंग की होती है। इसका केन्द्रीय भाग  संकरा होता है। इसकी फ़सल लग-भग  90-110 दिन में तैयार हो जाती है। पूसा केसर की पैदावार300-350 क्विंटल प्रति हेक्टेअर तक होती है।

पूसा मेघाली 
यह नारंगी गूदे, छोटी टॉप तथा कैरोटीन की अधिक मात्रा वाली संकर प्रजाति है। इसकी फ़सल बुवाई से 100-110 दिन में तैयार हो जाती है।
पैदावार 250-300 क्विंटल प्रति हेक्टेअर होती है.

पूसा यमदाग्नि

यह प्रजाति आई० ए० आर० आई० के क्षेत्रीय केन्द्र कटराइन द्धारा विकसित की गयी है। इसकी फसल 90-105 दिन मे तैयार हो जाती है। 
इसकी पैदावार 150-200 क्विंटल प्रति हेक्टेअर होती है.

नैन्टस

इस क़िस्म की जडें बेलनाकार तथा नांरगी रंग की होती है। जड़ के अन्दर का केन्द्रीय भाग मुलायम, मीठा होता है। इसकी फसल 110-112 दिन में तैयार हो जाती है। 
इसकी पैदावार 100-125 क्विंटल प्रति हेक्टेअर तक होती है।

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कीटनाशक खुद तैयार करें

Fri, 10/13/2017 - 06:05

एक एकड़ खेत के लिए अगर कीटनाशक तैयार करना है तो ः-
1) 20 लीटर किसी भी देसी गौमाता या देसी बैले का मूत्र चाहिए।
2) 20 लीटर मूत्र में लगभग ढार्इ किलो ( आधा किलो कम या ज्यादा हो सकता है ) नीम की पत्ती को पीसकर उसकी चटनी मिलाइए, 20 लीटर मूत्र में। नीम के पत्ते से भी अच्छा होता है नीम की निम्बोली की चटनी ।
3) इसी तरह से एक दूसरा पत्ता होता है धतूरे का पत्ता। लगभग ढार्इ किलो धतूरे के पत्ते की चटनी मिलाइए उसमें।
4) एक पेड़ होता है जिसको आक या आँकड़ा कहते हैं, अर्कमदार कहते हैं आयुर्वेद में। इसके भी पत्ते लगभग ढार्इ किलो लेकर इसकी चटनी बनाकर मिलाए।
5) जिसको बेलपत्री कहते हैं, जिसके पत्र आप शंकर भगवान के उपर चढ़ाते हैं । बेलपत्री या विल्वपत्रा के पते की ढार्इ किलो की चटनी मिलाए उसमें।
6) फिर सीताफल या शरीफा के ढार्इ किलो पतो की चटनी मिलाए उसमें।
7) आधा किलो से 750 ग्राम तक तम्बाकू का पाऊडर और डाल देना।
इसमें 1 किलो लाल मिर्च का पाऊडर भी डाल दें ।
9) इसमे बेशर्म के पत्ते भी ढार्इ किलो डाल दें ।
तो ये पांच-छह तरह के पेड़ों के पत्ते आप ले लो ढार्इ- ढार्इ किलो। इनको पीसकर 20 लीटर देसी गौमाता या देसी बैले मूत्र में डालकर उबालना हैं, और इसमें उबालते समय आधा किलो से 750 ग्राम तक तम्बाकू का पाऊडर और डाल देना। ये डालकर उबाल लेना हैं उबालकर इसको ठंडा कर लेना है और ठंडा करके छानकर आप इसको बोतलों में भर ले रख लीजिए। ये कभी भी खराब नहीं होता। ये कीटनाशक तैयार हो गया। अब इसको डालना कैसे है? जितना कीटनाशक लेंगे उसका 20 गुना पानी मिलाएं। अगर एक लीटर कीटनाशक लिया तो 20 लीटर पानी, 10 लीटर कीटनाशक लिया तो 200 लीटर पानी, जितना कीटनाशक आपका तैयार हो, उसका अंदाजा लगा लीजिए आप, उसका 20 गुना पानी मिला दीजिए। पानी मिलकर उसको आप खेत में छिड़क सकते हैं किसी भी फसल पर। इसको छिड़कने का परिणाम ये है कि दो से तीन दिन के अंदर जिस फसल पर आपने स्प्रै किया, उस पर कीट और जंतु आपको दिखार्इ नहीं देगें, कीड़े और जंतु सब पूरी तरह से दो-तीन दिन में ही खत्म हो जाते हैं, समाप्त हो जाते हैं। इतना प्रभावशाली ये कीटनाशक बनकर तैयार होता है। ये बड़ी-बड़ी विदेशी कम्पनियों के कीटनाशक से सैकड़ों गुणा ज्यादा ताकतवर है और एकदम फोकट का है, बनाने में कोर्इ खर्चा नहीं । देसी गौमाता या देसी बैले का मूत्र मुफ्त में मिल जाता है, नीम के पत्ते, निम्बोली, आक के पत्ते, आडू के पत्ते- सब तरह के पत्ते मुफ्त में हर गाँव में उपलब्ध हैं। तो ये आप कीटनाशक के रूप में, जंतुनाशक के रूप में आप इस्तेमाल करें ।

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टमाटर की पौध तैयार करना

Thu, 10/12/2017 - 05:04

पौध तैयार करने के लिये जमीन की सतह से 15 से 20 सेन्टी मीटर ऊचाई की क्यारी बनाकर इसमे बीज की बुवाई करते है। बीज की बुवाई करते समय बीज को मिट्टी मे ढेड से दो सेन्टीमीटर गहराई मे लगाते है तथा पक्तियों में बुवाई करते है। बीज की बुवाई के बाद क्यारी की ऊपरी सतह पर सडी हुई गोबर की खाद की पतली परत डालते है। तेज धूप, बरसात व ठंड से बचाने के लिए घास फूस से क्यारी को ढक देते है।  पूर्ण रूप से बीज अंकुरित हो जाने पर घास फूस हटा देना चाहिये।

पौध की रोपाई

जब पौध पांच से छः पत्ती की हो जाए तो इसे 60 सेन्टी मीटर चाौडी तथा जमीन की सतह से 20 सेन्टी मीटर ऊंची उठी हुई क्यारिया बनाकर इन पर रोपाई करते है। क्यारियो के दोनो तरफ 20 सेन्टी मीटर चैडी नालिया बनाते है। क्यारियो पर पौध की रोपाई करते समय पौधे से पौधे की दूरी 30 सेन्टी मीटर रखते है।

खेत की सिचांई

किसान भाईयो टमाटर की फसल के लिये पहली सिचांई पौध रोपई के बाद की जाती है। इसके बाद फसल की आवश्यकता अनुसार समय-समय पर सिचांई करते रहना चाहिये।

खर पतवार नियन्त्रण तथा निराई-गुडाई

टमाटर क् अच्छे उत्पादन के लिए समय-समय पर निराई-गुडाई करना चाहिये।
पहली निराई पौध रोपण के 20 दिन बाद करे। तथा दूसरी निराई पौध रोपण के 40 दिन बाद करना चाहिये।

फसल सुरक्षा तथा रोग से बचाव

किसान भाईये टमाटर की फसल मे लगने वाले रोग तथा उनका बचाव निम्न प्रकार है।

आद्र गलन ‘‘ डैम्पिंक आफ → आद्र गलन टमाटर की फसल का प्रमुख रोग है। इसके बचाव के लिए बीज को बुवाई से पूर्व कैपटाम व धीरम से उपचारित करना चाहिये। अगैती झुलसा- कापर आक्सी क्लोराइड की तीन ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल कर झिडकाव करना चाहिये।

पत्ती मोड विषाणु रोग→ पत्ती मोड विषाणु रोग मे सर्वप्रथम रोग ग्रस्त पौधे को उखाड कर जला देना चाहिये तथा मोनोक्रोटोफास दवा की दो मिली ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी की दर से 15 दिन के अन्तराल पर छिडकाव करना चाहिये।

टमाटर की प्रमुख प्रजातियां

काशी अमृत,काशी अनुपम,पूसा,स्र्वण वैभव,अविनाश-2 ,रूपाली आदि उपज- 500 से 700 कुन्तल प्रति हेक्टेयर बीज दर- 300 से 450 ग्राम प्रति हेक्टेयर 
फसल तैयार होने की अवधि → लगभग60 से 90 दिन मे टमाटर की फसल तैयार हो जाती है। जिसके के बाद किसान भाई फलो की तुडाई शुरू कर देते है।

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अंगूर की खेती- कैसे करें

Wed, 10/11/2017 - 05:00

हमारे देश में व्यावसायिक रूप से अंगूर की खेती पिछले लगभग छः दशकों से की जा रही है और अब आर्थिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण बागवानी उद्यम के रूप से अंगूर की खेती काफी उन्नति पर है। आज महाराष्ट्र में सबसे अधिक क्षेत्र में अंगूर की खेती की जाती है तथा उत्पादन की दृष्टि से यह देश में अग्रणी है। भारत में अंगूर की उत्पादकता Grapes Cropपूरे विश्व में सर्वोच्च है। उचित कटाई-छंटाई की तकनीक का उपयोग करते हुए मूलवृंतों के उपयोग से भारत के विभिन्‍न क्षेत्रों में अंगूर की खेती की व्‍यापक संभावनाएं उजागर हुई हैं।
भारत में अंगूर की खेती अनूठी है क्योंकि यह, उष्ण शीतोष्ण,सभी प्रकार की जलवायु में पैदा किया जा सकता है। हालांकि अंगूर की अधिकांशतः व्यावसायिक खेती (85प्रतिशत क्षेत्र में) उष्णकटिबन्धीय जलवायु वाले क्षेत्रों में (महाराष्ट्र,कर्नाटक,आन्ध्रप्रदेश और तमिलनाडु) तथा उपोष्ण कटिबन्धीय जलवायु वाले उत्तरी राज्यों में विशेष रूप से ताजा अंगूर उपलब्ध नहीं होते हैं। अतः उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्र जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश तथा दिल्ली व राजस्थान के कुछ भागों में अंगूर की खेती की जा रही है, जिससे जून माह में भी अंगूर मिलते हैं।

 

उपयोग

अंगूर एक स्वादिष्ट फल है. भारत में अंगूर अधिकतर ताजा ही खाया जाता है वैसे अंगूर के कई उपयोग हैं. इससे किशमिश, रस एवं मदिरा भी बनाई जाती है.

मिट्टी एवं जलवायु

अंगूर की जड़ की संरचना काफी मजबूत होती है. अतः यह कंकरीली,रेतीली से चिकनी तथा उथली से लेकर गहरी मिट्टियों में सफलतापूर्वक पनपता है लेकिन रेतीली, दोमट मिट्टी, जिसमें जल निकास अच्छा हो अंगूर की खेती के लिए उचित पाई गयी है. अधिक चिकनी मिट्टी में इसकी खेती न करे तो बेहतर है. अंगूर लवणता के प्रति कुछ हद तक सहिष्णु है. जलवायु का फल के विकास तथा पके हुए अंगूर की बनावट और गुणों पर काफी असर पड़ता है. इसकी खेती के लिए गर्म, शुष्क, तथा दीर्घ ग्रीष्म ऋतू अनुकूल रहती है. अंगूर के पकते समय वर्षा या बादल का होना बहुत ही हानिकारक है. इससे दाने फट जाते हैं और फलों की गुणवत्ता पर बहुत बुरा असर पड़ता है. अतः उत्तर भारत में शीघ्र पकने वाली किस्मों की सिफारिश की जाती है.

किस्में

उत्तर भारत में लगाई जाने वाली कुछ किस्मों की विशेषताएं नीचे दी जा रही हैं.

1-परलेट

2-ब्यूटी सीडलेस

3-पूसा सीडलेस

4-पूसा नवरंग

 

प्रवर्धन

अंगूर का प्रवर्धन मुख्यतः कटिंग कलम द्वारा होता है. जनवरी माह में काट छाँट से निकली टहनियों से कलमे ली जाती हैं. कलमे सदैव स्वस्थ एवं परिपक्व टहनियों से लिए जाने चाहिए. सामान्यतः 4 - 6 गांठों वाली 23 - 45 से.मी. लम्बी कलमें ली जाती हैं.कलम बनाते समय यह ध्यान रखें कि कलम का निचे का कट गांठ के ठीक नीचे होना चाहिए एवं ऊपर का कट तिरछा होना चाहिए. इन कलमों को अच्छी प्रकार से तैयार की गयी तथा सतह से ऊँची क्यारियों में लगा देते हैं. एक वर्ष पुरानी जड़युक्त कलमों को जनवरी माह में नर्सरी से निकल कर खेत में रोपित कर देते हैं.

बेलों की रोपाई

रोपाई से पूर्व मिट्टी की जाँच अवश्य करवा लें. खेत को भलीभांति तैयार कर लें. बेल की बीच की दुरी किस्म विशेष एवं साधने की पद्धति पर निर्भर करती है. इन सभी चीजों को ध्यान में रख कर 90 x 90 से.मी. आकर के गड्ढे खोदने के बाद उन्हें 1/2 भाग मिट्टी, 1/2 भाग गोबर की सड़ी हुई खाद एवं 30 ग्राम क्लोरिपाईरीफास, 1 कि.ग्रा. सुपर फास्फेट व 500 ग्राम पोटेशीयम सल्फेट आदि को अच्छी तरह मिलाकर भर दें. जनवरी माह में इन गड्ढों में 1 साल पुरानी जड़वाली कलमों को लगा दें. बेल लगाने के तुंरत बाद पानी आवश्यक है.

बेलों की छंटाई

 

अंगूर की बेल साधने हेतु पण्डाल, बाबर, टेलीफोन, निफिन एवं हैड आदि पद्धतियाँ प्रचलित हैं. लेकिन व्यवसायिक इतर पर पण्डाल पद्धति ही अधिक उपयोगी सिद्ध हुयी है. पण्डाल पद्धति द्वारा बेलों को साधने हेतु 2.1 - 2.5 मीटर ऊँचाई पर कंक्रीट के खंभों के सहारे लगी तारों के जाल पर बेलों को फैलाया जाता है. जाल तक पहुँचने के लिए केवल एक ही ताना बना दिया जाता है. तारों के जाल पर पहुँचने पर ताने को काट दिया जाता है ताकि पार्श्व शाखाएँ उग आयें.उगी हुई प्राथमिक शाखाओं पर सभी दिशाओं में 60 सेमी दूसरी पार्श्व शाखाओं के रूप में विकसित किया जाता है. इस तरह द्वितीयक शाखाओं से 8 - 10 तृतीयक शाखाएँ विकसित होंगी इन्ही शाखाओं पर फल लगते हैं.

छंटाई

बेलों से लगातार एवं अच्छी फसल लेने के लिए उनकी उचित समय पर काट - छाँट अति आवश्यक है. छंटाई कब करें : जब बेल सुसुप्त अवस्था में हो तो छंटाई की जा सकती है, परन्तु कोंपले फूटने से पहले प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए. सामान्यतः काट - छांट जनवरी माह में की जाती है.

सिंचाई

नवम्बर से दिसम्बर माह तक सिंचाई की खास आवश्यकता नहीं होती क्योंकि बेल सुसुप्ता अवस्था में होती है लेकिन छंटाई के बाद सिंचाई आवश्यक होती है. फूल आने तथा पूरा फल बनने (मार्च से मई ) तक पानी की आवश्यकता होती है. क्योंकि इस दौरान पानी की कमी से उत्पादन एवं हुन्वात्ता दोनों पर बुरा असर पड़ता है. इस दौरान तापमान तथा पर्यावरण स्थितियों को ध्यान में रखते हुए 7 - 10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए. फल पकने की प्रक्रिया शुरू होते ही पानी बंद कर देना चाहिए नहीं तो फल फट एवं सड़ सकते हैं. फलों की तुडाई के बाद भी एक सिंचाई अवश्य कर देनी चाहिए.

खाद एवं उर्वरक

अंगूर की बेल भूमि से काफी मात्र में पोषक तत्वों को ग्रहण करती है. अतः मिट्टी कि उर्वरता बनाये रखने के लिए एवं लगातार अच्छी गुणवत्ता वाली फसल लेने के लिए यह आवश्यक है की खाद और उर्वरकों द्वारा पोषक तत्वों की पूर्ति की जाये. पण्डाल पद्धति से साधी गई एवं 3 x 3 मी. की दुरी पर लगाई गयी अंगूर की 5 वर्ष की बेल में लगभग 500 ग्राम नाइट्रोजन, 700 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश, 700 ग्राम पोटेशियम सल्फेट एवं 50 - 60 कि.ग्रा. गोबर की खाद की आवश्यकता होती है.

खाद कब दें

छंटाई के तुंरत बाद जनवरी के अंतिम सप्ताह में नाइट्रोजन एवं पोटाश की आधी मात्र एवं फास्फोरस की सारी मात्र दाल देनी चाहिए. शेष मात्र फल लगने के बाद दें. खाद एवं उर्वरकों को अच्छी तरह मिट्टी में मिलाने के बाद तुंरत सिंचाई करें. खाद को मुख्य तने से दूर १५-२० सेमी गहराई पर डालें.

कैसे करें फल गुणवत्ता में सुधार

अच्छी किस्म के खाने वाले अंगूर के गुच्छे मध्यम आकर, मध्यम से बड़े आकर के बीजरहित दाने, विशिष्ट रंग, खुशबू, स्वाद व बनावट वाले होने चाहिए. ये विशेषताएं सामान्यतः किस्म विशेष पर निर्भर करती हैं. परन्तु निम्नलिखित विधियों द्वारा भी अंगूर की गुणवत्ता में अपेक्षा से अधिक सुधार किया जा सकता है.

फसल निर्धारण

फसल निर्धारण के छंटाई सर्वाधिक सस्ता एवं सरल साधन है. अधिक फल, गुणवत्ता एवं पकने की प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव छोड़ते हैं. अतः बेहतर हो यदि बाबर पद्धति साधित बेलों पर 60 - 70 एवं हैड पद्धति पर साधित बेलों पर 12 - 15 गुच्छे छोड़े जाएं. अतः फल लगने के तुंरत बाद संख्या से अधिक गुच्छों को निकाल दें.

छल्ला विधि

इस तकनीक में बेल के किसी भाग, शाखा, लता, उपशाखा या तना से 0.5 से.मी. चौडाई की छाल छल्ले के रूप में उतार ली जाती है. छाल कब उतारी जाये यह उद्देश्य पर निर्भर करता है. अधिक फल लेने के लिए फूल खिलने के एक सप्ताह पूर्व, फल के आकर में सुधार लाने के लिए फल लगने के तुंरत बाद और बेहतर आकर्षक रंग के लिए फल पकना शुरू होने के समय छाल उतारनी चाहिए. आमतौर पर छाल मुख्य तने पर 0.5 से.मी चौडी फल लगते ही तुंरत उतारनी चाहिए.

वृद्धि नियंत्रकों का उपयोग

बीज रहित किस्मों में जिब्बरेलिक एसिड का प्रयोग करने से दानो का आकर दो गुना होता है. पूसा सीडलेस किस्म में पुरे फूल आने पर 45 पी.पी.एम. 450 मि.ग्रा. प्रति 10 ली. पानी में, ब्यूटी सीडलेस मने आधा फूल खिलने पर 45 पी.पी.एम. एवं परलेट किस्म में भी आधे फूल खिलने पर 30 पी.पी.एम का प्रयोग करना चाहिए. जिब्बरेलिक एसिड के घोल का या तो छिडकाव किया जाता है या फिर गुच्छों को आधे मिनट तक इस घोल में डुबाया जाता है. यदि गुच्छों को 500 पी.पी.एम 5 मिली. प्रति 10 लीटर पानी में इथेफ़ोन में डुबाया जाये तो फलों में अम्लता की कमी आती है. फल जल्दी पकते हैं एवं रंगीन किस्मों में दानों पर रंग में सुधार आता है. यदि जनवरी के प्रारंभ में डोरमैक्स 3 का छिडकाव कर दिया जाये तो अंगूर 1 - 2 सप्ताह जल्दी पक सकते हैं.

फल तुड़ाई एवं उत्पादन

अंगूर तोड़ने के पश्चात् पकते नहीं हैं, अतः जब खाने योग्य हो जाये अथवा बाजार में बेचना हो तो उसी समय तोड़ना चाहिए. शर्करा में वृद्धि एवं तथा अम्लता में कमी होना फल पकने के लक्षण हैं. फलों की तुडाई प्रातः काल या सायंकाल में करनी चाहिए. उचित कीमत लेने के लिए गुच्छों का वर्गीकरण करें. पैकिंग के पूर्व गुच्छों से टूटे एवं गले सड़े दानों को निकाल दें. अंगूर के अच्छे रख - रखाव वाले बाग़ से तीन वर्ष पश्चात् फल मिलना शुरू हो जाते हैं और 2 - 3 दशक तक फल प्राप्त किये जा सकते हैं. परलेट किस्म के 14 - 15 साल के बगीचे से 30 - 35 टन एवं पूसा सीडलेस से 15 - 20 टन प्रति हैक्टेयर फल लिया जा सकता है.

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कृषि विधियों के नाम

Tue, 10/10/2017 - 05:02

सेरीकल्चर -- रेशमकीट पालन
एपिकल्चर -- मधुमक्खी पालन
पिसीकल्चर -- मत्स्य पालन
फ्लोरीकल्चर -- फूलों का उत्पादन
विटीकल्चर -- अंगूर की खेती
वर्मीकल्चर -- केंचुआ पालन
पोमोकल्चर -- फलों का उत्पादन
ओलेरीकल्चर -- सब्जियों का उत्पादन
हॉर्टीकल्चर -- बागवानी
एरोपोर्टिक -- हवा में पौधे को उगाना
हाइड्रोपोनिक्स -- पानी में पौधों को उगाना

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फ्लोरीकल्चर रोजगार का अवसर

Tue, 10/10/2017 - 04:29

किसी भी पार्टी, कान्फ्रेंस या फिर मीटिंग में जाएं,  वहां आज केटरिंग के बाद सबसे ज्यादा ध्यान फूलों की डेकोरेशन पर ही दिया जाता है। इन्हीं सब कारणों से फूलों से उत्पादन में खासा इजाफा देखने को मिल रहा है। फूल उगाने की इस प्रक्रिया को फ्लोरीकल्चर के नाम से जाना जाता है। यदि आपको भी फूलों से प्यार है और आप भी इस क्षेत्र में अपना भविष्य संवारना चाहते हैं, तो फिर इस दिशा में उपलब्ध र्कोस आपको सफलता के शिखर तक पंहुचा सकते हैं…

जीवन में खुशी के रंग भरना हो या फिर देवी-देवताओं को प्रसन्न करना हो या फिर किसी को श्रद्धांजलि अर्पित करना हो, इन सबमें  इजहार का माध्यम बनता है फूल। वैसे भी आजकल फूलों को लेकर की गई सजावट का कोई जवाब नहीं है। ये बेजान पड़ी चीजों में एक नई जान डाल देते हैं। आप किसी भी पार्टी, कान्फ्रेंस या फिर मीटिंग में जाएं,  वहां आज केटरिंग के बाद सबसे ज्यादा ध्यान फूलों की डेकोरेशन पर ही दिया जाता है। इन्हीं सब कारणों से फूलों के उत्पादन में खासा इजाफा देखने को मिल रहा है। फूल उगाने की इस प्रक्रिया को फ्लोरीकल्चर के नाम से जाना जाता है। यदि आपको भी फूलों से प्यार है और आप भी इस क्षेत्र में अपना भविष्य संवारना चाहते हैं, तो फिर इस दिशा में उपलब्ध र्कोस आपको सफलता के शिखर तक पंहुचा सकते हैं।

फ्लोरीकल्चर में काम

इस क्षेत्र में अनुभवी होने के लिए आपको कृषि विज्ञान में ग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट होना जरूरी है। तभी आप फ्लोरीकल्चर में महारत हासिल कर पाएंगे। फ्लोरीकल्चर पाठ्यक्रम के अंर्तगत फूलों को झड़ने से कैसे बचाया जाए, फूलों को लंबे समय तक सुरक्षित कैसे रखा जाए, उसकी अच्छी क्वालिटी को कैसे अधिक से अधिक बढ़ाया जाए, बड़े आकार के फूल व अधिक से अधिक संख्या में फूल का उत्पादन कैसे किया जाए, फूलों की कटिंग कैसे की जाए, ताकि दूसरे फूल को हानि न पंहुचे, कौन से फूल का उत्पादन बीज के जरिए किया जाए और कौन से फूल का बल्ब के जरिए यानी डंठल के जरिए, बेमौसम फूलों का उत्पादन कैसे किया जाए, एक्सपोर्ट के दौरान फूलों का संरक्षण कैसे किया जाए यानी फूलों से जुड़ी तमाम बातों की जानकारी इस पाठ्यक्रम के जरिए दी जाती है।

कोर्स एवं अवधि

ग्रेजुएट स्तर पर पढ़ाई के लिए चार साल व पोस्ट ग्रेजुएट स्तर पर पढ़ाई के लिए दो साल की समय सीमा निर्धारित है। वैसे स्टूडेंट्स जो नॉन एग्रीकल्चर क्षेत्र से आते हैं, उनके लिए पोस्ट ग्रेजुएट स्तर पर पढ़ाई के लिए तीन साल की समय सीमा निर्धारित है। इसके अलावा कुछ विश्वविद्यालयों में इंटर, डिप्लोमा व सर्टिफिकेट कोर्स का भी प्रावधान है। इन सभी की समय सीमा क्रमशः एक साल, दो साल से लेकर छह व तीन माह तक निर्धारित है। हालांकि अलग-अलग विश्वविद्यालयों के इस संबंध में अलग-अलग मापदंड निर्धारित हो सकते हैं।

रोजगार के अवसर

यह एक ऐसा क्षेत्र है, जहां आप सरकारी व निजी क्षेत्र के अलावा स्वयं का व्यवसाय कर अच्छा-खासा मुनाफा अर्जित कर सकते हैं क्योंकि अन्य फसल व सब्जी की अपेक्षा इसमें अधिक मुनाफा है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि देश में प्रतिवर्ष 20 प्रतिशत के हिसाब से फूलों की खपत बढ़ रही है। एक सर्वे के अनुसार फूलों के कारोबार से लगभग पूरे देश में पांच लाख लोग आजीविका चला रहे हैं। पूरे देश में फूलों की मांग के हिसाब से आपूर्ति महज केवल 60 प्रतिशत ही हो पाती है। इस हिसाब से देखा जाए, तो एक्सपोर्ट के कारोबार में फूलों का एक अच्छा स्कोप है। नौकरी व व्यवसाय के अलावा रिसर्च एवं टीचिंग के क्षेत्र को भी अपनाया जा सकता है। नर्सरी खोल कर स्वरोजगार करें तो अच्छी कमाई हो सकती है। इसके अलावा फ्लोरल डिजाइनर, लैंडस्केप डिजाइनर, फ्लोरीकल्चर थैरेपिस्ट, ग्राउंडकीपर्स, प्लांटेशन एक्सपर्ट के अलावा पीएचडी करके देश की किसी भी एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में बतौर लेक्चरर नियुक्त हो सकते हैं।

शैक्षणिक योग्यता

जो युवा इस क्षेत्र में अपना भाग्य आजमाने चाहते हैं,उनके लिए अनुभव बेहद जरूरी है। सर्टिफिकेटए डिप्लोमा और डिग्री जैसे कोर्स के लिए दस जमा दो में बायोलॉजी, फिजिक्स, केमिस्ट्री के साथ पास होना जरूरी है। लेकिन मास्टर्स डिग्री के लिए एग्रीकल्चर में बैचलर डिग्री जरूरी है। मास्टर्स डिग्री के लिए इंडियन काउंसिल ऑफ  एग्रीकल्चर रिसर्च द्वारा ऑल इंडिया एंट्रेंस टेस्ट परीक्षा ली जाती है। गौरतलब है कि किसी भी यूनिवर्सिटी में फ्लोरीकल्चर ऑनर्स की पढ़ाई नहीं करवाई जाती, बल्कि बीएससी एग्रीकल्चर में एक विषय के तौर पर फ्लोरीकल्चर पढ़ाया जाता है।

प्रमुख संस्थान

*    वाईएस परमार विश्वविद्यालय, नौणी हिमाचल प्रदेश

*    चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार

*    हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर

*    इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीच्य़ूट, नई दिल्ली

*    आनंद एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी आनंद, गुजरात

*    पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, लुधियाना, पंजाब

*    इलाहाबाद एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, इलाहाबाद

कहां बेचें फूल

दिल्ली में फूलों की सबसे बड़ी मंडी है। इस मंडी में देश-विदेश के फूल व्यापारी खरीद-फरोख्त करते हैं। लगभग सौ कंपनियां फूल उत्पादन व उनके व्यापार में 2500 करोड़ रुपए का पूंजी निवेश कर चुकी हैं। इन कंपनियों के एजेंट हर जगह उपलब्ध हैं। आप अपने खेतों में उत्पन्न फूलों को बेचने के लिए इनसे संपर्क कर सकते हैं। फूल सजावट के काम आते हैं। इससे माला, गजरा, सुगंधित तेल, गुलाब जल, गुलदस्ता, परफ्यूम आदि बनाए जाते हैं।

असीमित आमदनी

किसान यदि एक हेक्टेयर में गेंदे का फूल लगाते हैं तो वे वार्षिक आमदनी 1 से 2 लाख तक बढ़ा सकते हैं। इतने ही क्षेत्र में गुलाब की खेती करते हैं तो दोगुनी तथा गुलदाउदी की फसल से 7 लाख रुपए सालाना आसानी से कमा सकते हैं।

परिभाषा

फ्लोरीकल्चर हॉर्टिकल्चर की एक शाखा है, जिसमें फूलों की पैदावार मार्केटिंग, कॉस्मेटिक और परफ्यूम इंडस्ट्री के अलावा फार्मास्यूटिकल आदि शामिल हैं। युवा इस व्यवसाय को शुरू करके अच्छी खासी कमाई कर सकते हैं।

जगह कितनी हो

इस काम के लिए सवा बीघा जमीन काफी है, लेकिन जमीन पांच बीघा हो तो वारे-न्यारे हैं। इसे एक नर्सरी के तौर पर खोला जाए, जहां कम से कम दो नलकूप जरूर हों।

विविधता

फूलों में रैनन क्लाउज, स्वीट, विलियम, डेहलिया, लुपिन, वेरबना, कासमांस आदि के फूल लगा सकते हैं। इसके अलावा गुलाब की प्रजातियों में चाइना मैन, मेट्रोकोनिया फर्स्ट प्राइज, आइसबर्ग और ओक्लाहोमा जैसी नई विविधताएं हैं, जो शर्तिया कमाई देती हैं। इसके साथ-साथ मोगरा, रात की रानी, मोतिया, जूही आदि झाडियों के अलावा साइप्रस चाइना जैसे छोटे-छोटे पेड़ लगा कर अच्छी कमाई की जा सकती है।

पैदावार कब

फूलों की पैदावार के लिए सबसे उपयुक्त समय सितंबर से मार्च तक है, लेकिन अक्तूबर से फरवरी का समय इस व्यवसाय के लिए वरदान है। वैसे तो फूलों का कारोबार और पैदावार साल भर चलती है, पर जाड़ों में यह बढ़ जाती है।

बीमारी से बचाव

कीट भक्षी पक्षी और छोटे-छोटे कीड-मकोड़े फूलों के दुश्मन होते हैं। इनसे बचाव के पूरे इंतजाम होने चाहिए। समय-समय पर दवाओं का छिड़काव भी जरूरी है। सर्दियों में फूलों को बचाने के लिए क्यारियों पर हरे रंग की जाली लगानी चाहिए।

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जीरो बजट प्राकृतिक खेती क्या है?

Mon, 10/09/2017 - 05:28

जीरो बजट प्राकृतिक खेती देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र पर आधारित है। एक देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र से एक किसान तीस एकड़ जमीन पर जीरो बजट खेती कर सकता है। देसी प्रजाति के गौवंश के गोबर एवं मूत्र से जीवामृत, घनजीवामृत तथा जामन बीजामृत बनाया जाता है। इनका खेत में उपयोग करने से मिट्टी में पोषक तत्वों की वृद्धि के साथ-साथ जैविक गतिविधियों का विस्तार होता है। जीवामृत का महीने में एक अथवा दो बार खेत में छिड़काव किया जा सकता है।जबकि बीजामृत का इस्तेमाल बीजों को उपचारित करने में किया जाता है। इस विधि से खेती करने वाले किसान को बाजार से किसी प्रकार की खाद और कीटनाशक रसायन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है। फसलों की सिंचाई के लिये पानी एवं बिजली भी मौजूदा खेती-बाड़ी की तुलना में दस प्रतिशत ही खर्च होती है ।

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आयातित केंचुआ या देसी केंचुआ?

Sun, 10/08/2017 - 05:27

वर्मीकम्पोस्ट खाद बनाने में इस्तेमाल किये जाने वाले आयातित केंचुओं को भूमि के उपजाऊपन के लिये हानिकारक मानने वाले श्री पालेकर बताते है कि दरअसल इनमें देसी केचुओं का एक भी लक्षण दिखाई नहीं देता। आयात किया गया यह जीव केंचुआ न होकर आयसेनिया फिटिडा नामक जन्तु है, जो भूमि पर स्थित काष्ट पदार्थ और गोबर को खाता है। जबकि हमारे यहां पाया जाने वाला देशी केंचुआ मिट्टी एवं इसके साथ जमीन में मौजूद कीटाणु एवं जीवाणु जो फसलों एवं पेड़- पौधों को नुकसान पहुंचाते है, उन्हें खाकर खाद में रूपान्तरित करता है। साथ ही जमीन में अंदर बाहर ऊपर नीचे होता रहता है, जिससे भूमि में असंख्यक छिद्र होते हैं, जिससे वायु का संचार एवं बरसात के जल का पुर्नभरण हो जाता है । इस तरह देसी केचुआ जल प्रबंधन का सबसे अच्छा वाहक है । साथ ही खेत की जुताई करने वाले “हल “ का काम भी करता है ।

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मिर्च के हानिकारक रोग

Sat, 09/30/2017 - 16:46

मिर्च में सबसे अधिक हानि पत्तियों के मुडऩे से होती है जिसे विभिन्न स्थानों में कुकड़ा या चुरड़ा-मुरड़ा रोग के नाम से जाना जाता है। यह रोग न होकर थ्रिप्स व माइट के प्रकोप के कारण होता है। थ्रिप्स के प्रकोप के कारण मिर्च की पत्तियां ऊपर की ओर मुड़ कर नाव का आकार धारण कर लेती है। माइट के प्रकोप से भी पत्तियां मुड़ जाती है परन्तु ये नीचे की ओर मुड़ती हैं। मिर्च में लगने वाली माइट बहुत ही छोटी होती है जिन्हें साधारणत: आंखों से देखना सम्भव नहीं हो पाता है। यदि मिर्च की फसल में थ्रिप्स व माइट का आक्रमण एक साथ हो जाये तो पत्तियां विचित्र रूप से मुड़ जाती हैं। इसके प्रकोप से फसल के उत्पादन में बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। यहां यह जानना भी आवश्यक है कि माइट कीट नहीं है, इनके नियंत्रण में कीटनाशक उपयोगी सिद्ध नहीं होंगे। इनके लिए माइटीसाइड/ एकेरीसाइड का उपयोग करना होगा। यदि दोनों थ्रिप्स व माइट का प्रकोप एक साथ हुआ है तो कीटनाशक तथा माइटीसाइड का उपयोग एक साथ करना होगा। दोनों के प्रकोप की स्थिति में थ्रिप्स के लिए ट्राइजोफॉस 40 ई.सी. के 30 मि.ली. तथा माइट के लिए प्रोपरजाईट 57 प्रतिशत ईसी के 40 मि.ली. प्रति 5 लीटर पानी के अच्छे परिणाम देखने को मिले हैं।

एकीकृत कीट प्रबंधन
(अ) रसचूसक कीट
थ्रिप्स – इस कीट का वैज्ञानिक नाम (सिट्ररोथ्रिटस डोरसेलिस हुड़) है। यह छोटे-छोटे कीड़े, पत्तियों एवं अन्य मुलायम भागों से रस चूसते हैं। इसका आक्रमण प्राय: रोपाई के 2-3 सप्ताह बाद शुरु हो जाता है। फूल लगने के समय प्रकोप बहुत भयंकर हो जाता हैं पत्तियां सिकुड़ जाती है तथा मुरझा कर ऊपर की ओर मुड़ जाती हैं और नाव का आकार ले लेती है। थ्रिप्स द्वारा क्षतिग्रस्त पौधों को देखने से मोजेक रोग का भ्रम होता है। पौधे की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उपज बहुत कम हो जाती है।
माहू – (एफिस गोसीपाई ग्लोवर) यह कीट पत्तियों एवं पौधों के अन्य कोमल भागों से रस चूसकर पत्तियों एवं कोमल भागों पर मधुरस स्त्राव करते हैं, जिससे सूटी मोल्ड विकसित हो जाती है। परिणाम स्वरूप फल काले पड़ जाते हैं। यह कीट मोजेक रोग का प्रसार करता है।
सफेद मक्खी – (बेमेसिया टेबेकाई) इस कीट के शिशु एवं वयस्क पत्तियों की निचली सतह से रस चूसते हैं। कीट पर्ण कुंचन रोग को एक पौधे से दूसरे पौधे में फैलाते हैं।
नियंत्रण
– कीट की प्रारम्भिक अवस्था में नीमतेल 5 मिली. प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
– डायमिथिएट 30 ईसी या ट्राइजोफॉस 40 ईजी की 30 मि.ली. मात्रा तो 15 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
– कीट के अत्यधिक प्रकोप की अवस्था में 15 ग्राम एसीफेट या इमीडाक्लोप्रिड 18.5 एस.एल. की 5 मिली मात्रा 15 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
– फेनप्रोपाथ्रिन 0.5 मिली मात्रा को प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
मकड़ी – इस कीट का वैज्ञानिक नाम हेमीटारसोनेमस लाटस बैंक है। यह छोटे-छोटे जीव होते हैं, जो पत्तियों की निचली सतह से रस चूसते है। परिणामस्वरूप पत्तियाँ सिकुड़ कर नीचे की ओर मुड़ जाती हैं।
नियंत्रण
– क्लोरफेनापायर 1.5 मि.ली./लीटर या एवामेक्टिन 1.5 मिली/ लीटर या स्पाइरोमेसिफेन 0.75 मिली/लीटर या वर्टीमेक 0.75 मि.ली. पानी में घोलकर छिड़काव करें।
छेदक कीट
फल छेदक – (स्पेडोप्टेरा लाइटूरा फेब्रीसस) इस कीट की इल्ली फलों में छिद्र करके नुकसान पहुंचाती हंै। यह फलों में गोल छिद्र बनाकर उसके अंदर के भाग को खाती है। परिणाम स्वरूप फल झड़ जाते हैं।
नियंत्रण
– इस कीट की प्रारम्भिक अवस्था में नीमतेल 5 मिली. प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
– स्पाइनोसेड 0.4 मि.ली. या इण्डोक्साकार्ब 1 मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
कटुआ इल्ली (एग्रोटिस इप्सिलोन)-इस कीट की इल्ली रात्रि के समय पौधों को आधार से काट देती हैं। दिन के समय यह इल्लियाँ मिट्टी की दरारों के नीचे छुप जाती हैं।
सफेद लट – (एनोमाला बेनगेलेन्सिस होलोट्राइका कनसेनगुईना एवं होलोट्राइका रेनाउड़ी) – पहली वर्षा के समय इस कीट की मादा भूमि में अण्डे देती है। जिनसे ग्रब निकलते हैं जो कि पौधों की जड़ों को खाते हैं। ग्रसित पौधों के पास से मिट्टी से इल्ली निकाल कर उन्हें नष्ट करें।
नियंत्रण
– नीम की खली 1000 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की तैयारी के समय दें।
– क्लोरोपायरीफॉस 0.1 प्रतिशत का टोआ दें।
एकीकृत रोग प्रबंधन
आद्र्रगलन – यह रोग पीथियम एफिनिडेडरमेटम फाईटोप्थोरा स्पी नामक फफूंद से होता है। इस रोग में भूमि की सतह से पौधा गलकर नीचे गिर जाता है। नर्सरी में पौधो की सघनता, अधिक नमी, भारी मिट्टी, जल निकासी का न होना, उच्च तापमान रोग फैलाते हंै।
एन्थ्रेक्नोज – मिर्च का यह अतिव्यापक रोग है। यह रोग कोलेटोट्राइकम कैप्सी की नामक फफूंदी से होता है। विकसित पौधों पर रोग के कारण शाखाओं का कोमल ऊपर का भाग सूख जाता है। बाद में सूखने की क्रिया नीचे की ओर बढ़ती है। फलों पर यह रोग पकने की अवस्था में होता है। जब फल लाल होने लगते हैं उन पर छोटे काले और गोल धब्बे दिखाई पड़ते हैं ये धब्बे फल की लंबाई में बढ़ते हैं। बाद में इनका रंग धूसर हो जाता है। अंतिम अवस्था में फल काले होकर गिर जाते हैं।
उकटा रोग – यह रोग फ्यूजेरियम आक्सीस्पोरम उप जाति लाइकोपर्सिकी नामक फफूंद से होता है। इस रोग में पत्तियॉं नीचे की ओर झुक जाती हैं और पीली पड़कर सूख जाती हैं। अंत में पूरा पौधा मर जाता है।
फल गलन – यह रोग फाइटोप्योथेरा केपसिकी नामक फफूंद से होता है। इस रोग में फलों पर भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं एवं फल सड़ जाते हैं।
नियंत्रण
– 10 दिन के अंतर पर मेंकोजेब या मेटालेक्सिल (0.25 प्रतिशत) का छिड़काव करें।
– चूर्णिल आसिता – यह रोग (एरीसाइफी साइकोरेसिएरम) नामक फफूंद से होता है। रोग के लक्षण पत्तियों की ऊपरी सतह एवं नए तनों पर सफेद चूर्णी धब्बे पाउडर के रुप में दिखाई देते हैं।
प्रबंधन
– घुलनशील गंधक 2.5 ग्राम या कैराथन 1 मि.ली./लीटर पानी में घोलकर 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।
विषाणु रोग- यह एक विषाणु रोग है। यह तम्बाकू पर्ण कुंचन विषाणुु से होता है। इस रोग में पत्तियॉं छोटी होकर मुड़ जाती हैं। पूरा पौधा बोना हो जाता है। यह रोग सफेद मक्खी के द्वारा एक पौधे से दूसरे पौधे में फैलता है।
जीवाणु पत्ती धब्बा – इस रोग में नई पत्तियों पर हल्के पीले हरे एवं पुरानी पत्तियों पर गहरे जल सोक्त धब्बे विकसित हो जाते हैं। अधिक धब्बे बनने पर पत्तियॉं पीली होकर गिर जाती हैं।
प्रबंधन
– यह एक बीज एवं मिट्टी जनित रोग है। इसके लिए बीजोपचार एवं फसल चक्र अपनाना अति आवश्यक है।
– पौध रोपण के पूर्व बोर्डो मिश्रण 1 प्रतिशत या कापर आक्सीक्लोराइड 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर मृदा उपचार करें।
– ट्रायकोडर्मा 4 ग्राम एवं मेटालेक्सिल 6 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करें।
– रोग के प्रकोप की अवस्था में स्टे्रप्टोमाइसिन 2 ग्राम प्रति 15 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

मिर्च की क्षेत्रवार व्यवसायिक जातियां

राज्य जाति
आंध्रप्रदेश ज्वाला, एक्स-235, जी-1, जी-2, जी-3, जी-4, जी-5, एलसीए-205, 206, 235, कराकुल्लू, सन्नालूू, डिपायरप्पू, पुनासा, मदारू, भारत, अर्पणा, पोटीकायूलू, मोटा, चपाटा, देशी सिंधु, किरण, चिक्कावालापुर (लवांगी), सापोटा

कर्नाटका ज्वाला, वायादागी, जी-1, जी-2, जी-3, जी-4, जी-5, पूसा ज्वाला
केरला ज्वाला, सदाबहार, चम्पा, सीओ-1, नंदन
पाण्डिचेरी के-1, के-2, सीओ-1, सीओ-2
तमिलनाडु के-1, के-2, सीओ-1, सीओ-2, सीओ-3, पीएमके-1, पीएमके-2, वंडर, सनम
उत्तर क्षेत्र
बिहार रोरी, मोती, मिर्ची, चिट्टी
हरियाणा एनपी-46-ए, पूसा ज्वाला, पूसा समर
हिमाचल प्रदेश सोलन यलो, हाट पाटुगल, स्वीट बनाना, हुंगरायन वैक्स, पंजाब लाल
जम्मू एंड कश्मीर एनपी-46-ए, रतना रेड, केलीफोर्निया वंडर
पंजाब सीएच-1,सनाऊरी
उत्तर प्रदेश एनपी-46, ज्वाला पंत सी-1, देश,पहाड़ी, कल्याणपुरा, चमन एवं चंचल
पूर्व क्षेत्र
आसाम एनपी64-एम, पूसा ज्वाला, सूर्यमुखी, कृष्णा, बलीज्यूरी
त्रिपुरा ज्वाला, सूर्यमुखी, कृष्णा, वलीजबई
बेस्ट बंगाल सिटी एवं सूती,आकाशी,कजारी, बाओ, धानी, बुलिट, ढाला
पश्चिम क्षेत्र
गोआ ककाना हरमाल, तनवटी, लवांगी
गुजरात के-2, पंत सी-1, जवाहर-218, एन.पी46-ए, ज्वाला
राजस्थान सीएच-1, एनपी-46-ए, ज्वाला, पंत सी-1, जी-3, जी-5
मध्य क्षेत्र
मध्यप्रदेश पूसा ज्वाला, सोना-21, जवाहर, सदाबहार, अग्नि
महाराष्ट्र पतहोरी,बुगायत्री, धोवरी, ब्लैक सीड, चास्की, विभापुरी
उड़ीसा ज्वाला, देशी, सदाबहार

Category: खेती

पौधे कब और कैसे लगाएं

Sat, 09/30/2017 - 16:44

प्रख्यात वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बसु के अनुसंधानों से प्रमाणित हो चुका है कि वनस्पतियां भी हमारी तरह संवेदनशील जीविहैं। इनके भी जीवन चक्र होते हैं। बागवानी के हर काम में इन बातों पर ध्यान देना आवश्यक है।
आप की फुलवारी बराबर हरी-भरी रहे तथा बराबर फूल खिलते रहें तो पौधों का सही चुनाव होना भी जरूरी है। पेड़, पौधे अनेकों प्रकार और प्रजातियों के होते हैं। इनकी धूप, पानी, हवा, पौष्टिक भोजन (मिट्टी-खाद) आदि की आवश्यकताएं भी विभिन्न होते हैं। इन सभी बातों पर ध्यान देकर बागवानी करने पर ही पेड़, पौधे और फूल अच्छे होंगे। पौधों की सही जानकारियां होने से ही आप अपनी आवश्यकतानुसार पौधे चुन सकेंगे। इस धारावाहिक के विभिन्न भागों में प्रमुख फूल-पौधों की जानकारियां देने की चेष्टा की गई है। कुछ रोचक बातें भी बताई गई हैं।
पौधों के जीवन चक्र :- 1. सदाबहार पौधे जो अनेक वर्षों तक जीवित रहते हैं। सदा हरे-भरे रहते हैं और इनका पतझड़ नहीं होता। ये हैं- मनीप्लांट, अनेक प्रकार के सदाबहार तथा छाया में रहने वाले 'इनडोरप्लांट' आदि। 2. दीर्घ जीवी पौधे- इनके झाड़ अनेकों वर्षों तक जीवित रहते हैं। ये हैं गुलाब, कनेर, रंगन, मुसाएन्डा आदि 3. दो चार वर्ष जीवित रहने वाले पौधे। इनका प्रसारण बीज, कलम, जड़ से निकलने वाले शाखाओं और कंद से होता है। ये है डेजी, गोलार्डिया, क्रिसेन्थेयम, पोलिएन्थस आदि। 4. अल्पजीवी पौधे मौसमी फूलों के होते हैं जिन्हें बीज बोकर पैदा किया जाता है और मौसम समाप्त होने पर फूल होना बन्द होकर पौधे सूख जाते हैं। ये हैं- गेंदा, सूर्यमुखी, जीनिया, पिटूनिया आदि। 
स्थान और पात्र :- पौधे लगाने के पहले जमीन में गङ्ढे, क्यारियां तथा गमले तैयार करना पड़ता है। जमीन में लगाना हो तो गङ्ढे की गहराई और एक दूसरे से दूरी पौधों के आकार-प्रकार के अनुसार हो। गमले में लगाना हो तो मिट्टी के गमले ही लें क्योंकि ये पोरस होते हैं जिससे पौधों के जड़ों को प्रकाश और वायु मिलते रहे। इससे पौधों का विकास अच्छा होता है। ये सीमेन्ट, प्लास्टिक तथा धातु के गमलों में यह सुविधा नहीं है इसलिए पौधों के स्वास्थ्य के लिए ऐसे गमले उपयुक्त नहीं हैं। 
मिट्टी और खाद-हर प्रजाति के पौधों के लिये विभिन्न पौष्टिक तत्व चाहिए जो अनेक प्रकार की मिट्टी और खाद से मिलता है पर साधारण बागवानी के लिए जो भी मिट्टी उपलब्ध हो उसके दो भाग, गोबर की खाद दो भाग और एक भाग बालू का मिश्रण प्राय: सभी प्रकार के पौधों के लिए उपयोगी होगा। इसमें उबले चाय की पत्तियों तथा सूखे पत्तियों की खाद भी थोड़ी मिला सकते हैं जो बहुत लाभदायक है, ऐसा मेरा निजी अनुभव है। ऐसी मिट्टी तैयार कर जमीन के गङ्ढों और गमलों में भर कर काफी पानी देकर एक दो दिनों तक छोड़ दें। मिट्टी अच्छी तरह बैठ जाने के बाद दूसरे या तीसरे दिन वहां पौधे लगा सकते हैं।
पौधे कब और कैसे लगायें:- मौसमी फूल के पौधे फूल होने के एक या दो महीने पहले बीज से कहीं भी उगा कर दूसरी जगह लगा सकते हैं। यदि छोटे पौधे खरीद कर लायें तो उन्हें एक आधे घंटे पानी में भिगोने के बाद ही जमीन या गमले में लगायें। दूसरे पौधे यदि झोटे गमले या पालिथीन बैग के साथ खरीदे हो तो उन्हें निकालकर सीधे गमलों या क्यारियों के गङ्ढों में लगा सकते हैं। यदि खरीदे गये पौधे के जड़ के चारों ओर थोड़ी मिट्टी की पिन्डी हो तो पूरे पौधे को एक बाल्टी पानी में लगभग एक घंटे रखने के बाद ही लगाएं जिससे पिन्डी नर्म तथा पौधा तर हो जाए। दोपहर सूर्य ढलना आरम्भ हो जाने पर ही पौधों की दूसरी जगह लगाना अच्छा होता है, धूप की गर्मी से नये पौधों को हानि भी हो सकती है। 
एक राज की बात: अधिकांश पेड़, पौधों, लताओं के डाल-टहनियों से प्रसारण हो सकता है। वर्षा के मौसम में जिन पौधों, झाड़ों आदि के डाल आप को मिल जाए उनके टुकड़े जमीन में गाड़ देने पर 2-3 महीने में उनमें जड़ हो जायेगा। ऐसे पौधे खरीदने में धन व्यय नहीं होगा। 
कहीं भी पौधे लगा देना ही काफी नहीं है। उनमें धूप लगने तथा पानी खाद देने की व्यवस्था के अतिरिक्त समय-समय पर गुड़ाई-निकाई (कोडनी), काट-छांट (प्रूनिंग) आदि पर ध्यान देना भी आवश्यक है

Category: खेती

ऐसे होगी किसानों की आमदनी दोगुनी 7 सूत्र

Fri, 09/29/2017 - 05:00

किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने देश के सामने एक लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य है वर्ष 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने का। देश में पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने किसानों की समग्र भलाई के लिए इस तरह का कोई लक्ष्य देशवासियों के सामने रखा है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में कृषि मंत्रालय को यह काम 2022 तक अंजाम देना है। कृषि मंत्रालय पूरे मनोयोग और ईमानदारी के साथ प्रधानमंत्री के इस सपने को साकार करने में लगा हुआ है। देश के सभी जिलों में 15 अगस्त, 2017 से केवीके के संयोजन में किसानों की आय दुगनी करने के लिए संकल्प सम्मेलनों में बड़ी संख्या में किसान एवं अधिकारी संकल्प भी ले रहे हैं।
2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए कृषि मंत्रालय योजनाबद्ध तरीके से 7 सूत्री कार्य योजना पर काम कर रहा है।

पहला सूत्र --- उत्पादन में वृद्धि

मोटे तौर पर इसका मतलब है पर्याप्त संसाधन के साथ सिंचाई पर ध्यान केन्द्रित करना। यही वजह है कि सर्वप्रथम हमने सिंचाई में बजटीय आवंटन बढ़ाकर इस पर ध्यान केन्द्रित किया है।भारत के पास 142 मिलियन हेक्टेयर कृषि भूमि है जिसमें से केवल 48 प्रतिशत संस्थागत सिंचाई के तहत है। “हर खेत को पानी” के उद्देश्य के साथ 1 जुलाई 2015 से प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की शुरुआत की गयी ताकि सिंचाई आपूर्ति श्रंखला, जल संसाधनों, नेटवर्क वितरण और फार्म लेवल अनुप्रयोगों में सर्वागीण समाधान किया जा सके। हम इसमें समग्र दृष्टिकोण अपना रहे हैं जो सिंचाई और जल संरक्षण को मिलाता है। उद्देश्य “प्रति बूंद अधिक फसल” पाना है। साथ ही, वर्षों से लम्बित मध्यम एवं बड़ी सिंचाई योजनाओं को 4 वर्षों में प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त जल संचयन एवं प्रबंधन के साथ ही वाटर शेड डेवलपमेंट का कार्य भी तेज गति से कार्यन्वित हो रहा है।

दूसरा सूत्र --- इनपुट का प्रभावी उपयोग

इनपुट का प्रभावी उपयोग का अर्थ है गुणवत्तापूर्ण बीज, रोपण सामग्री, जैविक खेती एवं प्रत्येक खेत को मृदा स्वास्थ्य कार्ड एवं अन्य योजनाओं के माध्यम से उत्पादन में वृद्धि। दूसरे सूत्र में हम श्रेष्ठ बीजों एवं पोषकता पर जोर दे रहे हैं। जैविक खेती के लिए भी पहली बार नयी योजना प्रारंभ की गयी है। इसी प्रकार नीम कोटेड यूरिया के माध्यम से यूरिया की पर्याप्त उपलब्धता तथा यूरिया का अवैध रुप से रसायनिक उद्योग में दुरुपयोग भी समाप्त हो गया है। साथ ही,सॉयल हेल्थ कार्ड्स के प्रावधान से संतुलित उर्वरकों के उपयोग के कारण किसानों की लागत कम हो रही है एवं उत्पादन में बढ़ोतरी भी हो रही है। इसके अतिरिक्तो कृषि प्रक्षेत्र में नई तकनीक का उपयोग जैसे-कृषि प्रक्षेत्र के लिए स्पेहस टेक्नो लॉजी राष्ट्रीउय कार्यक्रम,किसान कॉल सेंटर, किसान सुविधा एप्पक जैसे दूरसंचार एवं ऑनलाईन माध्य‍मों से किसानों तक समय सूचना एवं एडवाइजरी भी पहुंचाई जा रही है।

तीसरा सूत्र --- उपज के बाद नुकसान कम करना

फसलों की उपज के बाद उसका भंडारण करना किसानों के लिए एक बड़ी समस्या है। भंडारण की सुविधा के अभाव में मज़बूरी में कम कीमत पर उपज की बिक्री करनी पड़ती है। इसलिए सरकार का मुख्य ध्यान किसानों को प्रोत्साहित करना है ताकि वे वेयर हाउस का उपयोग कर अपनी फसल को मजबूरी में ना बेचें । प्राप्त जमा रशीद के आधार पर किसानों को बैकों से ऋण मुहैया कराया जा रहा है, एवं ब्याज में छूट भी दी जा रही है। किसानों को नुक्सान से बचाने के लिए सरकार का पूरा फोकस ग्रामीण भंडारण एवं एकीकृत शीत श्रृंखला (Integrated Cold Chain) पर है।

चौथा सूत्र ---- गुणवत्ता में वृद्धि

सरकार खाद्य प्रसंस्क रण (food processing) के माध्यम से कृषि में गुणवत्ता को बढ़ावा दे रही है। छह हज़ार करोड़ रुपए के आवंटन (allocation) से प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना की शुरूआत की गई है। इसके तहत एग्रो प्रोसैसिंग क्ल स्ट रों के फार्वर्ड एवं बैकवर्ड लिंकेज पर कार्य करके फूड प्रौसेसिंग क्षमताओं का विकास किया जाएगा जिससे 20 लाख किसानों को लाभ मिलेगा और करीब साढ़े पांच लाख लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

पांचवा सूत्र --- विपणन

कृषि बाजार में सुधार, हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि मूल्य का बड़ा हिस्सा किसान तक पहुंचे और बिचौलियों की भूमिका न्यूनतम हो। इसके लिए केंद्र सरकार केंद्र सरकार कृषि बाजार में सुधार पर ज़ोर दे रही है। तीन सुधारों के साथ ई-राष्ट्रीय कृषि बाज़ार योजना की शुरूआत की गई है जिसमें अभी तक 455 मंडियों को जोड़ा जा चुका हैं । कई मंडियों में ऑनलाइन कृषि बाज़ार ट्रेंडिग भी शुरू हो चुकी है। इसके अतिरिक्तह सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में बाजार सुधार की दिशा में एक मॉडल एपीएमसी एक्ट राज्योंे को जारी किया गया है जिसमें निजी क्षेत्र में मंडी स्थादपना, प्रत्य क्ष विपणन मंडी यार्ड के बाहर बनाने का प्रावधान है। इसके अतिरिक्तम संविदा कृषि को बढ़ावा देने के लिए सरकार एक मॉडल एक्ट‍ बनाने का कार्य भी कर रही है। साथ ही, किसानों को फार्मर प्रोड्यूसर आर्गेनाइजेशन के रूप में संगठित भी किया जा रहा है जिससे उन्हे सिर्फ इकोनोमी ऑफ स्केल मिले बल्कि व्यापारियों के समक्ष उनकी सौदेबाजी शक्ति भी बढ़े।

छठा सूत्र --- जोखिम, सुरक्षा एवं सहायता

जिसके लिए केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना शुरू की है। यह किसानों की आय का सुरक्षा कवच है। खरीफ़ व रबी फसल में अब तक की सबसे न्यूनतम दर तय की गई है, जो क्रमशः अधिकतम 2 प्रतिशत और 1.5 प्रतिशत है । इसमें खड़ी फसल के साथ-साथ बुवाई से पहले और कटाई के बाद के जोखिमों को भी शामिल किया गया है। इतना ही नहीं, नुकसान के दावों का 25 प्रतिशत भुगतान भी तत्काल ऑनलाइन भुगतान किया जा रहा है। इस योजना में किसानों को फसल नुकसान के त्वशरित भुगतान हेतु उपज के अनुमान के लिए ड्रोन तकनीक तथा फसल कटाई के लिए स्मा र्ट फोन जैसी नई तकनीकों का उपयोग भी कई राज्यों में प्रारम्भइ किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, किसानों की सुविधा के लिए इस खरीफ मौसम से कस्टमर सर्विस सेंटर एवं बैंक आनलाइन जैसी नई तकनीकी सुविधाओं के माध्यम से प्रीमियम राशि जमा कराने का भी प्रावधान किया गया है।
प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान के राहत नियमों में भी सरकार ने बदलाव किए हैं। अब केवल 33 प्रतिशत फसल नुकसान होने पर भी सरकार अनुदान दे रही है। साथ ही अनुदान की राशि को 1.5 गुना बढ़ा दिया गया है।
जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभाव को भी कम करने के लिए अधिक सहनशीलता वाली किस्मों और पशुओँ की प्रजातियों का विकास तथा प्रभावित जिलों के लिए कॉनटिनजेंसी प्लान भी तैयार किए गये हैं।

सातवां और अतिंम सूत्र --- सहायक गतिविधियों

सहायक गतिविधि का अर्थ कृषि के अनुसंगी कार्यकलापों जैसे बागवानी,डेयरी विकास, पोल्ट्री, मधुमक्खीपालन, मत्स्य पालन, श्वेत क्रांति, नीली क्रांति,कृषि वानिकी,एकीकृत फार्मिंग (Integrated Farming) और रूरल बैकयार्ड पोल्ट्री डेवलपमेंट के जरिए किसानों की आमदनी बढ़ाना। हम सहायक गतिविधियों से किसानों की आय में बढोतरी करेंगे। अंशत: यह मुर्गीपालन, मधुमक्खी पालन, पशुपालन, डेयरी विकास एवं मत्स्यपालन के माध्यम से किया जाएगा। हम किसानों को उनकी भूमि के उस हिस्से का उपयोग करने का प्रोत्साहन दे रहे हैं जो जोता हुआ नहीं है, खासकर खेतों के बीच की सीमा वाला हिस्सा जिसका प्रयोग लकड़ी वाले वृक्ष उगाने एवं सौर सेल बनाने में किया जा सकता है। इसे अतिरिक्त बागवानी, कृषि वानिकी एवं समेकित कृषि पर भी विशेष बल दिया जा रहा है।

Category: खेती

DDU-GKY, Celebrating 3 years of Skilling India

Wed, 09/27/2017 - 14:57

Watch the transformational story of 5 proud DDU-GKY alumni who fought all odds to get skilled and become economically independent. The film highlights their point of transformation in a manner which brings out the impact that DDU-GKY training has had on their lives.

 

Category: दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजनाVideo: 

Mahurat of businesses with Rural Self Employment Training Institutes (RSETI)

Wed, 09/27/2017 - 04:58

Watch the heart warming tale of 4 rural entrepreneurs who have started their business post training from Rural Self Employment Training Institutes (RSETI) under Ministry of Rural Development. The film vividly captures the Mahurat of their business and the inspiration behind them becoming entrepreneurs.

 

Category: दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजनाVideo: 

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