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Updated: 14 hours 14 min ago

अधिक उपज देने वाली मूंग की किस्म तैयार

Sat, 11/18/2017 - 05:00

देश में दलहन की पैदावार न बढ़ने से दालों के आयात पर हमारी निर्भरता लगातार बढ़ रही है। ऐसे में दलहनों की पैदावार बढ़ाने लिए अधिक उपज वाली किस्में विकसित करना जरूरी है। इसे देखते हुए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के जेनेटिक और प्लांट ब्रीडिंग विभाग ने मूंग की अधिक उपज वाली मालवीय जनकल्याणी (एचयूएम 16) नई किस्म विकसित की है। इस किस्म की खासियत है कि यह महज दो माह में पककर तैयार हो जाती है। किसान इसकी बुवाई गेहूं की कटाई के बाद यानी अप्रैल माह में भी कर सकते हैं। जिससे बरसात से पहले इसकी कटाई की जा सके। इस तरह इस किस्म की खेती किसानों के लिए काफी फायदेमंद है। इसके अलावा इस किस्म में अन्य किस्मों के मुकाबले 25 फीसदी से अधिक प्रोटीन की मात्रा होती है। यह किस्म विषाणु रोग यानी पीला मोजैक से ग्रसित नहीं होने के कारण भी काफी फायदेमंद है। इस किस्म का दाना मूंग की अन्य किस्मों के मुकाबले ज्यादा बड़ा है, चमकीला और आकर्षक है। इस किस्म के 100 दाने का वजन 32 ग्राम है, जबकि अन्य किस्मों के इतने ही दानों का वजन 17.6 ग्राम है। उपरोक्त विशेषताओं की वजह से बाजार में इस किस्म की कीमत भी अधिक मिलने की उम्मीद है। भूमि की तैयारी मूंग की खेती के लिए दोमट व बलुई दोमट भूमि जिसमें जल निकास की समुचित व्यवस्था हो उपयुक्त मानी जाती है। खेत को किसी मिट्टी पलट हल से जुताई करके एक या दो बार देसी हल या हैरो से जोतकर भूमि को भुरभुरा कर समतल कर लेना चाहिए। बुवाई का समय जो किसान गेहूं की कटाई के बाद मूंग की खेती करना चाहते है, वे इसकी बुवाई अप्रैल में कर सकते हैं। खरीफ में इसकी बुवाई का उपयुक्त समय 25 जुलाई से 10 अगस्त के बीच अच्छा माना जाता है। बीज दर खरीफ में इसकी बुवाई करने पर एक हैक्टेयर में 15 किलोग्राम बीज बोना चाहिए। गेहूं की कटाई के बाद बुवाई करने पर 20 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर के हिसाब से बुवाई करनी चाहिए। उर्वरकों का प्रयोग मालवीय जनकल्याणी की मूंग की फसल में दस टन सड़ी हुई गोबर की खाद बुवाई के 10 से 15 दिन पहले डालनी चाहिए या 250 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट व 40 किलोग्राम यूरिया प्रति हैक्टेयर के हिसाब से प्रयोग करना होता है। ¨सगल सुपर फास्फेट की जगह 100 किलोग्राम डीएपी और 200 किलोग्राम जिप्सम प्रति हैक्टेयर की दर डाला जा सकता है। खाद की संपूर्ण मात्रा अंतिम जुताई के समय ही खेत में डाल देनी चाहिए।सिंचाई गर्मी में पहली सिंचाई बुवाई के 25 दिन के बाद करनी होती है। उसके बाद 10-15 दिन के अंतराल पर आवश्यकतानुसार एक या दो सिंचाई कर देनी चाहिए। यदि जमाव नमी के अभाव में ठीक न हो तो बुवाई के एक सप्ताह के अंदर हल्की सिंचाई कर देने से जमाव ठीक हो जाता है। खरपतवार नियंत्रण पहली सिंचाई के बाद उगे हुए खरपतवार निकाल देने से भूमि में वायु का संचार बढ़ जाता है, जिससे पौधे की जड़ों में क्रियाशील जीवाणु सक्रिय होकर वातावरणीय नाइट्रोजन को एकत्र करने में सहायता मिलती है। खरपतवार को नियंत्रित करने के लिए बुवाई के बाद व जमाव से पहले पेंडीमेथलीन 3.3 लीटर, 400-500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव कर सकते हैं।उपज इस किस्म से खरीफ सीजन में 10-15 क्विटल प्रति हैक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है। वहीं गेहूं की कटाई के बाद बुवाई करने पर इससे 15-18 क्विंटल प्रति हैक्टेयर के हिसाब से पैदावार प्राप्त होती है।आर्थिक लाभ मूंग की खेती करना किसानों के लिए काफी फायदेमंद है। इसकी खेती के द्वारा किसान एक हैक्टेयर से 30-40 रुपये का लाभ कमा सकते हैं। (बिज़नस भास्कर)

साभार: Ranars

आलू की फसल को झुलसा रोग व कीट से बचाने के उपाय

Fri, 11/17/2017 - 05:00

उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग ||प्रदेश में आलू के अच्छे उत्पादन हेतु सम-सामयिक महत्व के कीट/व्याधियों का उचित समय पर नियंत्रण नितान्त आवश्यक है। आलू की फसल पिछेती झुलसा रोग के प्रति अत्यन्त संवेदनशील होती है। प्रतिकूल मौसम विशेषकर बदलीयुक्त बूंदा-बांदी एवं नाम वातावरण में झुलसा रोग का प्रकोप बहुत तेजी से फैलता है तथा फसल को भारी क्षति पहुँचती है। ऐसी परिस्थितियों में उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग, उ0प्र0 द्वारा इस प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से आलू उत्पादकों को सलाह दी जाती है कि आलू की अच्छी पैदावार सुनिश्चित करने हेतु रक्षात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिये। यह जानकारी उद्यान निदेशक श्री एस0पी0 जोशी ने दी है। उन्होंने बताया कि पिछेती झुलसा रोग के प्रकोप से पत्तियाँ सिरे से झुलसना प्रारम्भ होती हैं, जो तीव्रगति से फैलती हैं। पत्तियों पर भूरे काले रंग के जलीय धब्बे बनते हैं तथा पत्तियों के निचली सतह पर रूई की तरह फफूँद दिखाई देती है। बदलीयुक्त 80 प्रतिशत से अधिक आर्द्र वातावरण एवं 10-20 डिग्री सेन्टीग्रेड तापक्रम पर इस रोग का प्रकोप बहुत तेजी से होता है और 2 से 4 दिनों के अन्दर ही सम्पूर्ण फसल नष्ट हो जाती है। श्री जोशी ने बताया कि आलू की फसल को पिछेती झुलसा रोग से बचाने के लिए जिंक मैगनीज कार्बामेट 2.0 से 2.5 कि0ग्रा0 को 800-1000 ली0 पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव किया जाये तथा आवश्यकतानुसार 10 से 15 दिन पर दूसरा छिड़काव काॅपर आक्सीक्लोराइड 2.5 से 3.0 कि0ग्रा0 अथवा जिंक मैगनीज कार्बामेट 2.0 से 2.5 कि0ग्रा0 तथा माहू कीट के प्रकोप की स्थिति में नियंत्रण के लिए दूसरे छिड़काव में फफूंदीनाशक के साथ कीट नाशक जैसे-डायमेथाएट 1.0 ली0 प्रति हेक्टेयर की दर से मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। उन्होंने जिन खेतों में पिछेती झुलसा रोग का प्रकोप हो गया हो तो ऐसी स्थिति में रोकथाम के लिये अन्तःग्राही (सिस्टेमिक) फफूँद नाशक मेटालेक्जिल युक्त रसायन 2.5 कि0ग्रा0 अथवा साईमोक्जेनिल युक्त फफूँदनाशक 3.0 कि0ग्रा0 प्रति हेक्टेयर की दर से 800-1000 ली0 पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने की सलाह दी है।

साभार: upnews360.in/N

मूंग की दो ऎसी प्रजातियां जो 55 दिन में ही तैयार होगी

Fri, 11/17/2017 - 05:00

कानपुर। भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान (आईआईपीआर) के वैज्ञानिकों ने मूंग की दो ऎसी प्रजातियां विकसित की है जो 55 दिन में ही तैयार हो जाएगी। अभी तक मूंग की फसल पकने में कम से कम 70 दिन का समय लगता था। जिससे 40 फीसद फसल बारिश की वजह से खराब हो जाता था।

 

 आइआइपीआर के वैज्ञानिकों ने मूंग की खेती के लिए आईपीएम 409-4 व आईपीएम-205-7 नामक दो नई प्रजातियां विकसित की है। मूंग की यह प्रजाति ग्रीष्म ऋतु के लिए उपयुक्त है जिसकी बोआई किसान अप्रैल में कर सकेंगे। जून में मानसून आने से पहले मूंग की इन नई प्रजातियों की फसल पककर तैयार हो जाएगी। आइआइपीआर के निदेशक डा. एनपी सिंह ने बताया कि अभी तक मूंग की जितनी भी प्रजातियां हैं उन्हें पकने में कम से कम 70 दिन का समय लगता था। जून के अंतिम सप्ताह तक आने वाले मानसून के कारण इस फसल का काफी भाग बर्बाद हो जाया करता था।

 

 मूंग की इन नई प्रजातियों को पकने में कम समय लगने के साथ इनके दानों में चमक भी होगी। इन दोनों प्रजातियों के दाने हरे व मध्यम आकार के होंगे। प्रजाति विकसित करने में आठ साल का समय लगा: मूंग की नई प्रजातियों को विकसित करने में वैज्ञानिकों को सात से आठ वर्ष का समय लगा है। कई अलग अलग जांचों में सफल होने के बाद अब इन प्रजातियों के परीक्षण का काम अंतिम चरणों में चल रहा है।

 

 किसानों तक यह प्रजातियां 2015-16 तक पहुंच जाएंगी। खास बातें: उत्पादन: इन नई प्रजातियों का उत्पादन 12 से 13 कुंतल प्रति हेक्टेयर होगा। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, केंद्रीय उत्तर प्रदेश व राजस्थान में बुवाई के लिए उपयुक्त। वर्तमान समय में पूरे देश में 28 लाख हेक्टेयर में बोई जाती है मूंग की फसल।> इन नई प्रजातियों के साथ अगले वर्ष 35 हेक्टेयर की जमीन पर मूंग की खेती की संभावना।

साभार: Khaskhabar

केले की खेती

Thu, 11/16/2017 - 05:00

अगर आप केले (Banana) की खेती करने का सोच रहे है तो इस खेती के लिए वैज्ञानिक तकनीको को अपनाएं। केले की खेती से किसानो को काफी मुनाफा हो सकता है क्योंकी केला पका हो या फिर कच्चा बाज़ार में इन दोनों के अच्छे दाम मिल जाते है । केले के अच्छे उपज के लिए कुछ बातों का खास ख्याल रखना होता है जैसे की भूमि और मिट्टी का चयन , पौधे की सिंचाई, आदि । तो आइये हम जानते है  कैसे करे केले की खेती ।

केले की खेती की जानकारी

केले की खेती में अच्छे उपज की प्राप्ति उसके जलवायु पर depend करता है । पश्चमी और उत्तरी भारत में केले के बिज रोपन का सही समय मानसून के शुरुआत में होता है जो की जून या जुलाई का महिना होता है।

भूमि का चयन व तैयारी 

वैसे तो केले की खेती सभी प्रकार के मिट्टी पर की जा सकती है लेकिन दोमट मिट्टी जिसमे जल निकासी की अच्छी व्यवस्था हो तो उसे सबसे सर्वोतम माना जाता है । बीज रोपने से पहले मिट्टी पलटने वाली हल द्वारा भूमि की अच्छे से जुताई कर लेनी चाहिए साथ ही मांदा निर्माण कर के केले की खेती करने से अधिक उत्पादन होता है

बीज रोपन 

बिज रोपने से पहले भूमि को गहरा जुताई कर के उसे भुरभुरा बना लेना चाहिए और फिर उस भूमि को ट्रेक्टर या पाटा द्वारा समतल बना देना चाहिए। जब खेत अच्छे से तैयार हो जाये तो फिर उसमे 50 cm लम्बा, 50 cm चौड़ा और 50 cm गहरा गड्ढा खोद लेना चाहिए । केले के रोपन के वक़्त ऊँची जाती के पौधों को 3 m और छोटे जातियों के पौधों को 2 m की दूरी पर रोपना चाहिए

सिंचाई प्रबंधन:केले के खेती में सिंचाई की अव्यश्कता भूमि और जलवायु पर निरभर करता है। अगर पौधे को  रोपने के बाद एक दो दिन के अन्दर वर्षा ना हो रही हो तो तुरंत सिंचाई कर देनी चाहिए । जाड़े के मौसम में लगभग 10 से 12 दिनों के अंतर में और गर्मी की समय लगभग 5 से 7 दिनों के अंतर में सिंचाई करनी चाहिए ।

केले के खेती में अच्छे उपज के लिए कृषि वैज्ञानिको द्वारा बताए गए तरीको से खाद देनी चाहिए। पौधे को रोपने समय गड्ढे में गोबर (cow dung) की खाद 20 kg, nitrogen 100 gram, सल्फर (sulfur) 150 gram और पोटाश (potash) 150 gram देना चाहिए

रोग / किट पतंग 

केले के पौधे को रोगों से बचाने के लिए थोड़ी सी सावधानी बरतनी पड़ती है । तना विविं और माहू ये दोनों केले के पौधे में लगने वाले कीटो के नाम है ।

केले के पौधों को प्रभावित करने वाले रोगो का नाम है 

 

पनामा रोग:- इस रोग से 50 प्रतिशत से अधिक फसल का नुकसान हो जाता है।

बंची टॉप रोग

पण चत्ति रोग

 

केले के पौधों में लगने वाले इन रोगों और कीटो से बचने के लिए वैज्ञानिको की सलाह अनुसार फफूंदी नाशक दवाइयों का इस्तेमाल करनी चाहिए

साभार: /kele-ki-vaigyanik

मिट्टी की खाद में नाइट्रोजन की भूमिका

Wed, 11/01/2017 - 05:30

नाइट्रोजन (Nitrogen), भूयाति या नत्रजन एक रासायनिक तत्व है जिसका प्रतीक N है। इसका परमाणु क्रमांक 7 है। सामान्य ताप और दाब पर यह गैसहै तथा पृथ्वी के वायुमण्डल का लगभग 78% नाइट्रोजन ही है। यह सर्वाधिक मात्रा में तत्व के रूप में उपलब्ब्ध पदार्थ भी है। यह एक रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन और प्रायः अक्रिय गैस है। इसकी खोज 1772 में स्कॉटलैण्ड के वैज्ञनिक डेनियल रदरफोर्ड ने की थी।

आवर्त सारणी के १५ वें समूह का प्रथम तत्व है। नाइट्रोजन का रसायन अत्यंत मनोरंजक विषय है, क्योंकि समस्त जैव पदार्थों में इस तत्व का आवश्यक स्थान है। इसके दो स्थायी समस्थानिक, द्रव्यमान संख्या 14, 15 ज्ञात हैं तथा तीन अस्थायी समस्थानिक (द्रव्यमान संख्या 13, 16, 17) भी बनाए गए हैं।

नाइट्रोजन तत्व की पहचान सर्वप्रथम 1772 ई. में रदरफोर्ड और शेले ने स्वतंत्र रूप से की। शेले ने उसी वर्ष यह स्थापित किया कि वायु में मुख्यत: दो गैसें उपस्थित हैं, जिसमें एक सक्रिय तथा दूसरी निष्क्रिय है। तभी प्रसिद्ध फ्रांसीसी वैज्ञानिक लाव्वाज़्ये ने नाइट्रोजन गैस को ऑक्सीजन (सक्रिय अंश) से अलग कर इसका नाम 'ऐजोट' रखा। 1790 में शाप्टाल (Chaptal) ने इसे नाइट्रोजन नाम दिया।

खेती में ज्यादा खर्चा और उपज के मूल्य (मुख्यत: अनाज) में कमी-यही कारण है कि अधिक फसल होने के बाद भी किसान का आर्थिक लाभ नहीं बढ़ा है। इसके विपरीत रासायनिक खाद, कीटनाशक एवं संकरित बीज की खातिर लिया गया कर्जा दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है जो किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर कर रहा है। साथ ही इनके उपयोग से भूमि की सजीवता की हत्या हो रही है।

इस कर्जे से मुक्ति का एक ही उपाय है। किसान बाजार आधारित रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों का कम से कम प्रयोग करे। अपने खेत अथवा परिसर में उत्पन्न होने वाले कूड़े, कचरे एवं गोबर से अच्छा खाद बनाकर एवं गोमूत्र से अच्छा कीटरोधक बनाकर उसका उपयोग फसल उत्पादन एवं फसल रक्षण के लिए करें। किसानों द्वारा गङ्ढे में बनाई गई खाद अथवा गोबर के ढेर से निकाली गई खाद पूर्णत: पकी हुई खाद न होने की वजह से प्राय: उसके अपेक्षित परिणाम फसल पर नहीं होते जिसकी वजह से उन्हें रासायनिक खाद डालने पर मजबूर होना पड़ता है। हमारे खेत में उत्पन्न होनेवाले कूड़े कचरे का उपयोग करके अच्छी खाद कैसे बनाई जाए इस पर ध्यानं दे कर भारी खर्च  से बचा जा सकता है .

मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिये एक उपजाऊ जमीन का होना सबसे जरुरी है। उपजाऊ जमीन एक जीवित जीव कि तरह है जिसे अपनी उत्पादकता बढाने के लिए निरंतर पोषण ली आवश्यकता है। कार्बनिक पदार्थों से इस प्रकार का पोषण प्राप्त किया जा सकता है।

निर्देश: 1. अपनी मिट्टी की खाद में नाइट्रोजन की ज्यादा मात्र होती है और आपकी मिट्टी के लिए एक आवश्यक पोषक तत्व है। खाद को फावड़ा और टिलर के साथ मिट्टी में मिलाना ज्यादा जरूरी है न कि खाद को उपर से डालना। आप अपने घर कि खाद का इस्तेमाल कर सकते हैं या बाजार से भी खरीद सकते हैं।

2. गाय या घोड़े कि खाद अपनी मिट्टी में इस्तेमाल करें। यह काम में अच्छी तरह से सुनिश्चित किया जा सकता है। इस खाद में नाइट्रोजन कि प्रचुर मात्रा होती है, जो पौधों में हरी पत्तियों के विकास को प्रोत्साहित करती है।

3. रोग मुक्त मिट्टी के लिए कटे हुए पत्ते भी मिटटी में मिला दें। यह ध्यान रहे की इन पत्तों में सड़ांध या कवक शामिल नहीं हो, अन्यथा यह मिटटी को ख़राब कर सकते हैं। आप एक फावड़े से इन पत्तों को मिट्टी में मिला सकते हैं। आप अपने घास काटने वाले यंत्र से भी पत्ते काट कर सकते हैं।

4. ज्यादा गीली या ज्यादा सूखी मिटटी में कार्बनिक पदार्थ मिलाने से बचें। तब तक मिटटी में कुछ नहीं मिलाएं जब तक कि वह भुरभुरी न हो जाये।

Category: खेती

खेत की तैयारी में छुपा है पौध संरक्षण

Tue, 10/31/2017 - 05:18

वर्ष में अधिकांश खेती का रकबा दो फसली फसल प्रणाली के तहत चलता है कुछ आंशिक क्षेत्र में जायद की फसलों को लगाकर अतिरिक्त आय के साधन की व्यवस्था की जाती है। फसल चाहे कोई भी हो खाद्यान्नों की हो अथवा उद्यानिकी सभी में कीट, रोगों का आक्रमण आम बात है और पौध संरक्षण में बचाव की भूमिका को यदि अधिक महत्व दिया जाये तो एक तीर से दो शिकार सम्भव हो सकेगा। एक तो पौध संरक्षण में कीट/ रोगों के उपचार पर होने वाले व्यय की बचत हो सकेगी। दूसरा कीटनाशकों के उपयोग से होने वाली पर्यावरण की हानि पर भी रोक लग सकेगी।

ग्रीष्मकाल से ही यदि कृषक समझ जाये और पौध व्याधियों के कारकों को नष्ट करने का प्रयास सतत शुरू करें तो भविष्य की खेती में कीट/ रोगों के आक्रमण के जोखिम को काफी हद तक क्षति सीमा के भीतर ही रखा जा सकता है। अनेकों कवक एवं कीटों की शंखियां भूमि के भीतर में समय व्यतीत करते हैं और जब उनका भोजन उपलब्ध होता है तब भण्डारण तक पीछा नहीं छोड़ते हैं। रबी की मुख्य फसल गेहूं की जाति लोक-1 आज भी लोकप्रिय है परन्तु उसमें कंडुआ बार-बार आकर अपना विस्तार कर रहा है। कृषक चाहे तो इस जाति को बदल कर नई जाति का चयन करके कंडुआ से छुटकारा पायें। यदि लोक-1 लगाना इतना ही जरूरी है तो जेठ-वैशाख की कड़ी धूप में केवल बुआई के लिए रखे गेहूं को सुबह चार घंटे ठण्डे पानी में भिगोकर निकालकर सीमेंट अथवा टीन की सीट पर अच्छी तरह से फैलाकर सुखा लें। ध्यान रहे 4 घंटे से अधिक नहीं फुलोयें तथा कड़ी धूप में अच्छी तरह से सुखायें। इस क्रिया से बीज के भीतर छिपी कवक को समाप्त किया जा सकता है।

सोयाबीन की गर्डल बीटल, लीफ माइरन, गेरुआ मेढ़ों पर पनपते खरपतवारों पर राज करते हैं। इन खरपतवारों को समूल नष्ट करना जरूरी कार्य आप का ही होगा। ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करके भूमिगत कीट,रोगों तथा खरपतवारों के पौधों को नष्ट किया जा सकता है। पूर्व में खेती केवल पेट भरने का जरिया था परन्तु उसे अब व्यवसाय मान लिया गया है और व्यवसाय में थोड़ी सी भी कोताही नुकसान दे सकती है। पहले एक फसली कार्यक्रम खरीफ, रबी क्षेत्र विशेष की जलवायु भूमि के आधार पर की जाती थी परन्तु आज दो सौ प्रतिशत फसल सघनता और आंशिक क्षेत्रों में 300 प्रतिशत तक की फसल सघनता हो रही है। अर्थात् वर्ष भर व्यस्त कार्यक्रम ग्रीष्मकाल में यदि पौध संरक्षण के उत्पादों का अमल कर लिया जाये तो भविष्य की चिन्ता समाप्त हो जाएगी।

दीमक जो ना केवल खेती का दुश्मन है बल्कि एक सामाजिक दुश्मन बन गई है। कीमती से कीमती सामान को बिना शोरगुल के हानि पहुंचाने में दीमक के पैर धनवानों की तिजोरियों तक आसानी से पहुंच जाते हैं इसकी रोकथाम के लिये ग्रीष्मकाल सबसे उपयुक्त समय है। खेतों में घूम-घूमकर दीमक के बमीठों की पहचान करें और उसमें छिपी दीमक की रानी जो एक दिन में 3 हजार तक अण्डे देकर अपने विस्तार में नहीं चूकती उसे समाप्त करके कष्ट के कारक का ही खात्मा करने का यह अच्छा समय है। उल्लेखनीय है कि दीमक के प्रकोप से खेतों और घरों में करोड़ों की हानि संभव है। इस खाली वक्त में खेतों में उपयोग किये जाने वाली मशीनों की भी साफ-सफाई रखरखाव विशेषकर पौध संरक्षण यंत्रों का रखरखाव जरूरी है। ध्यान रहे उपचार से बचाव महत्वपूर्ण है तो आज ही इस पर विचार करके कार्यक्रम बनायें।

साभार:कृषक जगत

Category: खेती

एंटीबायोटिक्स को बेअसर करती खाद

Mon, 10/30/2017 - 06:19

रिसर्चरों को पता चला है कि गाय की खाद से ऐसे कई एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीन्स मिट्टी में उगने वाली सब्जियों में पहुंच जाते हैं. ये जीन हमारे खाने में पहुंच कर शरीर को कई एंटीबायोटिक दवाओं के लिए बेअसर बना रहे हैं.
इंसान ने सभ्यता की शुरूआत से ही पशु पालन किया है. आजकल गाय जैसे कई जानवरों को जल्दी से जल्दी बड़ा करने और बीमारियों से बचाने के लिए लगातार छोटी मात्रा में एंटीबायोटिक दवाइयों के डोज दिए जाते हैं. इन्हीं गायों के गोबर से बनी खाद का इस्तेमाल भी सदियों से खेतों को और उपजाऊ बनाने में होता आया है. अब पता चला है कि सिर्फ मांस खाने से ही नहीं, गाय के गोबर से बनी खाद में भी ये प्रतिरोधक पहुंच जाते हैं और जमीन से होते हुए इंसान के शरीर में भी. अमेरिका में की गई एक नई स्टडी में पाया गया है कि इन खेतों में उगाई गई सब्जियों में खाद से कुछ गुण आ जाते हैं. खाद में कई ऐसे जीन होते हैं जो इंसान के शरीर में पहुंच कर उसे एंटीबायोटिक्स के लिए और प्रतिरोधक बना सकते हैं. इसके कारण शरीर पर एंटीबायोटिक्स का असर कम हो जाएगा.
सन् 1928 में जब जब अलेक्सेंडर फ्लेमिंग ने पहली एंटीबायोटिक दवाई पेन्सिलीन का अविष्कार किया तब वह विज्ञान की दुनिया में क्रांतिकारी कदम था. वह पहला रसायन था जिससे बैक्टीरिया के संक्रमण से लड़ा जा सकता था. दवाई खा खा कर बैक्टीरिया ऐसा ताकतवर हुआ कि हमारी नाक में दम कर रहा है. समय बीतने के साथ साथ बैक्टीरिया पर एंटीबायोटिक दवाओं के लगातार इस्तेमाल के कारण असर कम हो गया. इसी के कारण सुपरबग या महाकीटाणु बनने लगे. ये सुपर बग एक एन्जाइम है जिसके किसी बैक्टीरिया के साथ आने से उस पर एंटीबायोटिक्स दवाओं का असर नहीं होता.
इस तरह के विशेष गुणों वाले जीन गाय की आंतों में रहने वाले बैक्टीरिया से आते हैं. वैसे तो अभी तक ऐसा कोई जीन उन सुपरबग में नहीं मिला है जो इंसानों को संक्रमित कर रहे हैं लेकिन रिसर्चरों का मानना है कि इसका खतरा बना हुआ है. येल यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने इस स्टडी के लिए कनेक्टिकट की एक डेयरी की गायों के खाद के सैंपल इकट्ठे किए. उन सेंपलों में वैज्ञानिकों को करीब 80 अलग अलग तरह के एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीन्स मिले. इनमें से तीन चौथाई जीन्स ऐसे हैं जिनके बारे में अभी ज्यादा जानकारी नहीं है.
इन जीन्स को लैब में जब ई. कोलाई नाम के एक बैक्टीरिया के साथ मिलाया गया तो इस जीन ने बैक्टीरिया को पेन्सिलीन और टेट्रासाइक्लिन जैसी कई प्रचलित एंटीबायोटिक्स के लिए प्रतिरोधी बना दिया. सिर्फ चार गायों से इकट्ठे किए गए सैंपल में इतने सारे एंटीबायोटिक्स के लिए प्रतिरोधी बनाने वाले जीन्स के मिलने से रिसर्चर हैरान हैं. लेकिन गायों से मिले ऐसे जीन्स की संख्या अब भी मुर्गियों से मिले ऐसे जीनों से कम है. आमतौर पर मुर्गी के चूजों को जल्दी जल्दी बड़ा करने के लिए गायों के मुकाबले चार गुना ज्यादा एंटीबायोटिक्स दिए जाते हैं.
'एमबायो' नामके प्रकाशन में छपी इस स्टडी से जुड़े येल यूनिवर्सिटी के माइक्रोबायोलॉजिस्ट जो हैंडल्समैन बताते हैं, "इतने छोटे से सैंपल साइज में हमें जितने तरह के जीन्स मिले वह अपने आप में उल्लेखनीय है." रिसर्चरों का मानना है कि इस विषय के कई और पहलुओं पर शोध की जरूरत है. पता लगाना होगा कि गाय के खाद में ऐसे कितने एंटीबायोटिक्स प्रतिरोधी जीन्स हैं जो खाद से मिट्टी, मिट्टी से उसमें उगने वाली चीजों और उससे हमारे खाने की प्लेट तक पहुंच सकते हैं.

Category: खेती

जैविक खाद क्या है

Sat, 10/28/2017 - 07:20

जैविक खाद वे सूक्ष्म जीव हैं जो मृदा में पोषक तत्वों को बढ़ा कर उसे उर्वर बनाते हैं। प्रकृति में अनेक जीवाणु और नील हरित शैवाल पाए जाते हैं जो या तो स्वयं या कुछ अन्य जीवों के साथ मिलकर वायुमण्डलीय नाइट्रोजन का यौगिकीकरण करते हैं( वातावरण में मौजूद गैसीय नाइट्रोजन को अमोनिया में परिवर्तित करते हैं)। इसी प्रकार, प्रकृति में अनेक कवक और जीवाणु पाए जाते हैं जिनमें मृदा में बंद्ध फॉस्फेट को मुक्त करने की क्षमता होती है। कुछ ऐसे कवक भी होते हैं जो कार्बनिक पदार्थों को तेजी से विघटित करते हैं जिसके फलस्वरूप मृदा को पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। अत: जैविक खादें नाइट्रोजन के यौगिकीकरण, फॉस्फेट की घुलनशीलता और शीघ्र पोषक तत्व मुक्त करके मृदा को उपजाऊ बनाती हैं।
 

जैंविक खादों का उपयोग आज समय की आवश्यकता क्यों है?
मृदा की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने वाले रसायनिक उर्वरक काफी महंगे होते हैं और इनका उत्पादन अनवीकरणीय पेट्रोलियम फीडस्टॉक से किया जाता है जो धीरे-धीरे कम हो रहा है। रसायनिक खादों का निरंतर उपयोग मृदा के लिए हानिकारक होता है। उदाहरण के लिए, नाइट्रोजनी खाद यूरिया का अत्यधिक उपयोग मृदा की संरचना को नष्ट कर देता है। इस प्रकार मृदा, वायु और जल जैसे अपरदनकारी कारकों से क्षरण के प्रति संवेदनशील हो जाती है। रसायनिक खादें सतह और भूमिगत जल प्रदूषण के लिए भी उत्तरदायी होती हैं। इसके अतिरिक्त, नाइट्रोजनी खादों के प्रयोग से फसलोंं पर रोग और नाशीजीवों के प्रकोप की भी संभावना रहती है। रसायनिक खादों के निरंतर प्रयोग से मृदा में ह्यूमस और पोषक तत्वों की कमी हो जाती हैं जिसके परिणामस्वरूप उसमें सूक्ष्म जीव कम पनपते हैं। रसायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग के कारण भारतीय मृदाओं में कार्बनिक पदार्थों और नाइट्रोजन की आमतौर पर कमी पाई जाती है। सुपरफॉस्फेट के अत्यधिक उपयोग से पौधों में तांबे और जस्ते की कमी हो जाती है। उक्त के अतिरिक्त, रासायनिक खादें खाद्य फसलों के पोषक तत्वों की मात्रा को भी बदल देती हैं। नाइट्रोजनी खाद यूरिया के अत्यधिक प्रयोग से खाद्यान्नों में पोटैशियम तत्व की कमी हो जाती है। इसी प्रकार, पोटाश का अत्यधिक प्रयोग करने से पौधों में विटामिन सी और कैरोटीन अंश की कमी हो जाती है। नाइट्रेट खाद फसल की पैदावार को तो बढ़ाती है लेकिन ऐसा प्रोटीन की कीमत पर होता है। इसके अतिरिक्त, इससे प्रोटीन के अणुओं में एमिनों अम्लों का संतुलन बिगड़ जाता है जिसके कारण प्रोटीन की गुणवत्ता कम हो जाती है।

Category: खेती

वर्मी कम्पोस्ट के लाभ

Fri, 10/27/2017 - 05:24

केंचुआ खाद या वर्मीकम्पोस्ट (Vermicompost) पोषण पदार्थों से भरपूर एक उत्तम जैव उर्वरक है। यह केंचुआ आदि कीड़ों के द्वारा वनस्पतियों एवं भोजन के कचरे आदि को विघटित करके बनाई जाती है।

वर्मी कम्पोस्ट में बदबू नहीं होती है और मक्खी एवं मच्छर नहीं बढ़ते है तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता है। तापमान नियंत्रित रहने से जीवाणु क्रियाशील तथा सक्रिय रहते हैं। वर्मी कम्पोस्ट डेढ़ से दो माह के अंदर तैयार हो जाता है। इसमें 2.5 से 3% नाइट्रोजन, 1.5 से 2% सल्फर तथा 1.5 से 2% पोटाश पाया जाता है।

केंचुआ खाद की विशेषताएँ : इस खाद में बदबू नहीं होती है, तथा मक्खी, मच्छर भी नहीं बढ़ते है जिससे वातावरण स्वस्थ रहता है। इससे सूक्ष्म पोषित तत्वों के साथ-साथ नाइट्रोजन 2 से 3 प्रतिशत, फास्फोरस 1 से 2 प्रतिशत, पोटाश 1 से 2 प्रतिशत मिलता है।

  • इस खाद को तैयार करने में प्रक्रिया स्थापित हो जाने के बाद एक से डेढ़ माह का समय लगता है।
  • प्रत्येक माह एक टन खाद प्राप्त करने हेतु 100 वर्गफुट आकार की नर्सरी बेड पर्याप्त होती है।
  • केचुँआ खाद की केवल 2 टन मात्रा प्रति हैक्टेयर आवश्यक है।
  1. • वर्मी कम्पास्ट, सामान्य कम्पोस्टिंग विधि से एक तिहाई समय (2 से 3 माह) में ही तैयार हो जाता है।
  2. • वर्मी कम्पोस्ट में गोबर की खाद (एफ.वाई.एम.) की अपेक्षा नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश तथा अन्य सूक्ष्म तत्व अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।
  3. • वर्मी कम्पोस्ट के सूक्ष्म जीव, एन्जाइम्स, विटामिन तथा वृद्विवर्धक हार्मोन प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं।
  4. • केंचुआ द्वारा निर्मित खाद को मिट्टी में मिलाने से मिट्टी की उपजाऊ एवं उर्वरा शक्ति बढ़ती है, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव पौधों की वृद्धि पर पड़ता है।
  5. • वर्मी कम्पोस्ट वाली मिट्टी में भू-क्षरण कम होता है तथा मिट्टी की जलधारण क्षमता में सुधार होता है।
  6. • खेतों में केंचुओं द्वारा निर्मित खाद के उपयोग से खरपतवार व कीड़ो का प्रकोप कम होता है तथा पौधों की रोग रोधक क्षमता भी बढ़ती है।
  7. • वर्मी कम्पास्ट के उपयोग से फसलों पर रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों की मांग कम होती है जिससे किसानों का इन पर व्यय कम होता है।
  8. • वर्मी कम्पोस्ट से प्राकृतिक संतुलन बना रहता है, साथ ही भूमि, पौधों या अन्य प्राणियों पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता।

 

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केंचुआ खाद बनाना वर्मी कम्पोस्टिंग

Fri, 10/27/2017 - 05:23

केंचुआ द्वारा जैव- विघटनशील व्यर्थ पदार्थों के भक्षण तथा उत्सर्जन से उत्कृष्ट कोटि की कम्पोस्ट (खाद) बनाने को वर्मीकम्पोस्टिंग कहते हैं। वर्मी कम्पोस्ट को मिट्टी में मिलाने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति तो बढ़ती ही है, साथ ही साथ फसलों की पैदावार व गुणवत्ता में भी बढ़ोत्तरी होती है। रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक इस्तेमाल से मृदा पर होने वाले दुष्प्रभावों का वर्मी कम्पोस्ट के उपयोग से सुधार होता है। इस प्रकार वर्मी कम्पोस्ट भूमि की भौतिक, रासायनिक व जैविक दशा में सुधार कर मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को टिकाऊ करने में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।

अनुमानत: 1 कि.ग्रा. भार में 1000 से 1500 केंचुए होते हैं। प्राय:1 केंचुआ 2 से 3 कोकून प्रति सप्ताह पैदा करता है। तत्पश्चात हर कोकून से 3-4 सप्ताह में 1 से 3 केंचुए निकलते हैं। एक केंचुआ अपने जीवन में लगभग 250 केंचुए पैदा करने की क्षमता रखता है। नवजात केंचुआ लगभग 6-8 सप्ताह पर प्रजननशील अवस्था में आ जाता है। प्र

तिदिन एक केंचुआ लगभग अपने भार के बराबर मिट्टी, खाकर कम्पोस्ट में परिवर्तित कर देता है। एक कि.ग्रा. केंचुए एक वर्ग मीटर क्षेत्र में 45 किलोग्राम अपघटनशील पदार्थों से 25 से 30 किग्रा. वर्मी कम्पोस्ट 60 से 70 दिनों में तैयार कर देते हैं।

जैविक खाद:

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जल प्रबंधन क्या है?

Thu, 10/26/2017 - 06:24

जल संसाधन पानी के वह स्रोत हैं जो मानव के लिए उपयोगी हों या जिनके उपयोग की संभावना हो। पानी के उपयोगों में शामिल हैं कृषि, औद्योगिक, घरेलू, मनोरंजन हेतु और पर्यावरणीय गतिविधियों में। वस्तुतः इन सभी मानवीय उपयोगों में से ज्यादातर में ताजे जल की आवश्यकता होती है।

धरातलीय जल या सतही जल पृथ्वी की सतह पर पाया जाने वाला पानी है जो गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में ढाल का अनुसरण करते हुए सरिताओं या नदियों में प्रवाहित हो रहा है अथवा पोखरों, तालाबों और झीलों या मीठे पानी की आर्द्रभूमियों में स्थित है। किसी जलसम्भर में सतह के जल की प्राकृतिक रूप से वर्षण और हिमनदों के पिघलने से पूर्ति होती है और वह प्राकृतिक रूप से ही महासागरों में निर्वाह, सतह से वाष्पीकरण और पृथ्वी के नीचे की ओर रिसाव के द्वारा खो जाता है।
हालाँकि कि किसी भी क्षेत्रीय जल तंत्र में पानी का प्राकृतिक स्रोत वर्षण ही है और इसकी मात्रा उस बेसिन की भौगोलिक अवस्थिति और आकार पर निर्भर है। इसके अलावा एक जल तंत्र में पानी की कुल मात्रा किसी भी समय अन्य कई कारकों पर निर्भर होती है। इन कारकों में शामिल हैं झीलों, आर्द्रभूमियों और कृत्रिम जलाशयों में भंडारण क्षमता; इन भण्डारों के नीचे स्थित मिट्टी की पारगम्यता; बेसिन के भीतर धरातलीय अपवाह के अभिलक्षण; वर्षण की अवधि, तीव्रता और कुल मात्रा और स्थानीय वाष्पीकरण का स्तर इत्यादि। यह सभी कारक किसी जलतंत्र में जल के आवागमन और उसके बजट को प्रभावित करते हैं।
मानव गतिविधियाँ इन कारकों पर एक बड़े पैमाने पर प्रभाव डाल सकती हैं। मनुष्य अक्सर जलाशयों का निर्माण द्वारा बेसिन की भंडारण क्षमता में वृद्धि और आद्रभूमि के जल को बहा कर बेसिन की इस क्षमता को घटा देते हैं। मनुष्य अक्सर अपवाह की मात्रा और उस की तेज़ी को फर्शबन्दी और जलमार्ग निर्धारण से बढ़ा देते हैं।
किसी भी समय पानी की कुल उपलब्ध मात्रा पर ध्यान देना भी जरूरी है। मनुष्य द्वारा किये जा रहे जल उपयोगों में से बहुत सारे वर्ष में एक निश्चित और अल्प अवधि के लिये ही होते हैं। उदाहरण के लिए अनेक खेतों को वसंत और ग्रीष्म ऋतु में पानी की बड़ी मात्रा की आवश्यकता होती है और सर्दियों में बिल्कुल नहीं। ऐसे खेत को पानी उपलब्ध करने के लिए, सतह जल के एक विशाल भण्डारण क्षमता की आवश्यकता होगी जो साल भर पानी इकठा करे और उस छोटे समय पर उसे प्रवाह कर सके जब उसकी आवश्यकता हो। वहीं दूसरी ओर कुछ अन्य उपयोगों को पानी की सतत आवश्यकता होती है, जैसे की विद्युत संयंत्र जिस को ठंडा करने के लिए लगातार पानी चाहिये। ऐसे बिजली संयंत्र को पानी देने के लिए सतह पर प्रवाहित जल की केवल उतनी ही मात्रा को भंडारित करने की आवश्यकता होगी कि वह नदी में पानी के कम होने की स्थिति में भी बिजली संयंत्र को शीतलन के लिये पानी उपलब्ध करा सके।
दीर्घकाल में किसी बेसिन के अन्दर वर्षण द्वारा पानी की कितनी मात्रा की पूर्ती की जाती है यही उस बेसिन की मानव उपयोगों हेतु जल उपलब्धता की ऊपरी सीमा होती है।
प्राकृतिक धरातलीय जल की मात्रा को किसी दूसरे बेसिन क्षेत्र से नहर या पाइप लाइन के माध्यम से आयात द्वारा संवर्धित किया जा सकता है। मनुष्य प्रदूषण द्वारा जल को 'खो' सकता है (यानी उसे बेकार बना सकता है)।
मीठे जल के भण्डारों के मामले में ब्राज़ील दुनिया सबसे अधिक जल भण्डार रखने वाला देश है जिसके बाद बाद दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं रूस और कनाडा।

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खतरनाक खाद है या हमारी अधकचरी सोच?

Wed, 10/25/2017 - 06:12

अज्ञान और अनुदान की सरकारी नीति के कारण नाइट्रोजन उर्वरक का उपयोग हमेशा ज्यादा रहा है। सरकार यूरिया पर सबसे ज्यादा छूट देती है और किसान भी यूरिया ही सबसे ज्यादा इस्तेमाल करता है। यही कारण है कि देश में बिकनेवाली समस्त रासायनिक खाद में से आधी मात्रा सिर्फ यूरिया की है। जिसकी वजह से मिट्टी की पोषकता और पर्यावरण को लगातार नुकसान हो रहा है। उदाहरण के लिए, 50 किलो वजन वाले यूरिया के एक थैले में मात्र 23 किलो ही नाइट्रोजन होता है शेष 27 किलो तो राख या फिलर होता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइ.सी.ए.आर.) के अध्ययन के अनुसार यूरिया के अकेले और लगातार इस्तेमाल के कारण उत्पादकता घटी है। मिट्टी के क्षरण के चलते न केवल इसमें अम्लीयता एवं लवणता बढ़ी है बल्कि भौतिक गुण जैसे पानी सोखने की क्षमता और मिट्टी की संरचना को भी नुकसान हुआ है, इसलिए जैविक खाद का उपयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया है। और दूसरी तरफ रासायनिक खाद पर अनुदान  सन 2001-2002 से अब तक 12,000 करोड़ रुपये से बढ़कर एक लाख करोड़ रुपये सालाना हो गया है। यह उर्वरक अनुदान किसानों को सस्ती खाद मुहैया कराने के मकसद से दिया जा रहा है लेकिन इसका अधिकतम लाभ किसान को नहीं खाद निर्माताओं को मिल रहा है।
ये आंकडे इस बात के द्योतक हैं कि हमारी कथनी और करनी में भारी अंतर है। एक तरफ हम रासायनिक खाद के अवगुण गिनवा रहे हैं तो दूसरी ओर उसके इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए अनुदान की राशि बढ़ा रहे हैं। देश बड़े भ्रम की स्थिति में है कि किस बात को सच माने। खबर आती है कि कृषि योग्य जमीन और उत्पादकता दोनों निरंतर घट रही है साथ ही ये समाचार भी मिलते हैं कि बम्पर पैदावार के कारण सरकार के पास उसे रखने की जगह तक नहीं है। यही वजह है कि कृषि विषेशज्ञों की इस चेतावनी को कि- यूरिया का असंतुलित प्रयोग खेती व स्वास्थ्य दोनों के लिए खतरनाक है को कोई नहीं सुनता। देश के तीन चौथाई किसान छोटी जोत वाले हैं। ये किसान अपनी उपलब्ध जमीन से हर हाल में अधिकतम पैदावार लेना चाहेंगें, इस बात की परवाह किए बगैर कि उनके द्वारा प्रयोग की जा रही रासायनिक खाद और कीटनाशक जमीन या पर्यावरण पर कितना बुरा असर डालेंगें। सच्चाई तो यह है कि किसान की जमीन लगातार घटती जा रही है, और वह कम जमीन से अधिकतम पैदावार लेने के लिए आंख मूंदकर रासायनिक खादों का प्रयोग करेगा।

ऐसे में हमें कुछ प्रश्नों पर विचार करना पड़ेगा कि

(1) क्या खेत में रसायनों का प्रयोग खतरनाक है? 

(2) यह भय कि हमारी जरूरत देसी परम्परागत बीजों और ढ़ेर सारे जानवरों के गोबर से बनी खाद से पूरी हो पाएगी?

(3) यह चिन्ता कि क्या देसी बीज और तकनीक के भरोसे विशाल सवा अरब आबादी का पेट भरा जा सकता है?

(4 )क्या यह संभव है कि नीम की खली और पत्तियों का इस्तेमाल कर फसलों को कीटों के प्रकोप से बचाया जा सकता है?

(5)क्या इतनी संख्या में नीम के पेड़ हैं देश में? हकीकत यह है कि छोटी जोत के चलते गोबर खाद और अन्य कृषि कार्यों के लिए जानवर रखना वैसे ही असंभव हो चुका है।

रासायनिक खाद के अंधाधुंधा इस्तेमाल को रोकना इसलिए भी संभव नहीं कि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाऐं विकासशील देशों की सरकारों को कृषि पर अनुदान देने से मना कर सकती हैं। दरअसल उनका पहला लक्ष्य अपने देश की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों फायदा पहुंचाने का है न कि हमें सहयोग देने का।
इसलिए अब समय आ गया है कि हम पहले यह तय करें कि रासायनिक खाद ज्यादा खतरनाक है या हमारी अधकचरी नीतियां? हमें एक बार फिर अपनी कृषि योजनाओं को पुन: परिभाषित करना होगा क्योंकि इन हालातों में हम अपनी संतानों के लिए शायद ही हम कृषि योग्य जमीन छोड़े ही नहीं पाएंगे। जैसा कि स्पेनिश दार्शनिक होमे आर्तिगा ई गामेत कहते हैं कि- 'हमारी देशभक्ति भी अब दावं पर लगी हुई है, आज देशभक्ति का अर्थ अपने पुरखों की भूमि की रक्षा करना ही नहीं अपितु अपनी संतानों के लिए भूमि संरक्षण भी है।'

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जैविक खेती से लाभ

Tue, 10/24/2017 - 05:26

जैविक खेती (Organic farming) कृषि की वह विधि है जो संश्लेषित उर्वरकों एवं संश्लेषित कीटनाशकों के अप्रयोग या न्यूनतम प्रयोग पर आधारित है तथा जो भूमि की उर्वरा शक्ति को बचाये रखने के लिये फसल चक्र, हरी खाद, कम्पोस्ट आदि का प्रयोग करती है। सन् १९९० के बाद से विश्व में जैविक उत्पादों का बाजार काफ़ी बढ़ा है।

संपूर्ण विश्व में बढ़ती हुई जनसंख्या एक गंभीर समस्या है, बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ भोजन की आपूर्ति के लिए मानव द्वारा खाद्य उत्पादन की होड़ में अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए तरह-तरह की रासायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों का उपयोग, प्रकृति के जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान के चक्र को (इकालाजी सिस्टम) प्रभावित करता है, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति खराब हो जाती है, साथ ही वातावरण प्रदूषित होता है तथा मनुष्य के स्वास्थ्य में गिरावट आती है।

प्राचीन काल में मानव स्वास्थ्य के अनुकुल तथा प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप खेती की जाती थी, जिससे जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान का चक्र निरन्तर चलता रहा था, जिसके फलस्वरूप जल, भूमि, वायु तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता था। भारत वर्ष में प्राचीन काल से कृषि के साथ-साथ गौ पालन किया जाता था, जिसके प्रमाण हमारे ग्रांथों में प्रभु कृष्ण और बलराम हैं जिन्हें हम गोपाल एवं हलधर के नाम से संबोधित करते हैं अर्थात कृषि एवं गोपालन संयुक्त रूप से अत्याधिक लाभदायी था, जोकि प्राणी मात्र व वातावरण के लिए अत्यन्त उपयोगी था। परन्तु बदलते परिवेश में गोपालन धीरे-धीरे कम हो गया तथा कृषि में तरह-तरह की रसायनिक खादों व कीटनाशकों का प्रयोग हो रहा है जिसके फलस्वरूप जैविक और अजैविक पदार्थो के चक्र का संतुलन बिगड़ता जा रहा है और वातावरण प्रदूषित होकर, मानव जाति के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। अब हम रसायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों के उपयोग के स्थान पर, जैविक खादों एवं दवाईयों का उपयोग कर, अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं जिससे भूमि, जल एवं वातावरण शुद्ध रहेगा और मनुष्य एवं प्रत्येक जीवधारी स्वस्थ रहेंगे।

मिट्टी मे किये जाने वाले सुधार:-

मिटटी की गुणवत्ता नीव है जिस पर जैविक खेती खड़ी होती है! खेती के तरीको से कोशिश है की मिट्टी की उर्वरता का निर्माण और रखरखाव बना रहे! इसके लिए एकाधिक फसले उगाना, फसलो का परिक्रमण, जैविक खाद और कीटनाशक और न्यूनतम जुताई आदि तरीके है! मिट्टी मे मूल जैविक तत्व प्राकृतिक पौधो के पौष्टिक तत्वों से बना है, जो की हरी खाद, पशु का खाद, काम्पोस्ट और पौधो के अवशेष से बना है. ऐसी सूचना है की मिट्टी में जैविक खेती के दौरान कम घनत्व, उच्च जल धारण क्षमता, उच्च माइक्रोबियल और उच्च मिट्टी श्वसन गतिविधिया होती है.

जैविक खेती से होने वाले लाभ

कृषकों की दृष्टि से लाभ

·         भूमि की उपजाऊ क्षमता में वृद्धि हो जाती है।

·         सिचाई अंतराल में वृद्धि होती है।

·         रासायनिक खाद  पर निर्भरता कम होने से लागत में कमी आती है।

·         फसलों की उत्पादकता में वृद्धि।

मिट्टी की दृष्टि से

जैविक खाद के उपयोग करने से भूमि की गुणवत्ता में सुधार आता है।

·         भूमि की जल धारण क्षमता बढ़ती हैं।

·         भूमि से पानी का वाष्पीकरण कम होगा।

पर्यावरण की दृष्टि से

·         भूमि के जल स्तर में वृद्धि होती है।

·         मिट्टी, खाद्य पदार्थ और जमीन में पानी के माध्यम से होने वाले प्रदूषण मे कमी आती है।

·         कचरे का उपयोग, खाद बनाने में, होने से बीमारियों में कमी आती है।

·         फसल उत्पादन की लागत में कमी एवं आय में वृद्धि

·         अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्पर्धा में जैविक उत्पाद की गुणवत्ता का खरा उतरना।

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मिट्टी की खाद में नाइट्रोजन की भूमिका

Mon, 10/23/2017 - 05:25

नाइट्रोजन (Nitrogen), भूयाति या नत्रजन एक रासायनिक तत्व है जिसका प्रतीक N है। इसका परमाणु क्रमांक 7 है। सामान्य ताप और दाब पर यह गैसहै तथा पृथ्वी के वायुमण्डल का लगभग 78% नाइट्रोजन ही है। यह सर्वाधिक मात्रा में तत्व के रूप में उपलब्ब्ध पदार्थ भी है। यह एक रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन और प्रायः अक्रिय गैस है। इसकी खोज 1772 में स्कॉटलैण्ड के वैज्ञनिक डेनियल रदरफोर्ड ने की थी।

आवर्त सारणी के १५ वें समूह का प्रथम तत्व है। नाइट्रोजन का रसायन अत्यंत मनोरंजक विषय है, क्योंकि समस्त जैव पदार्थों में इस तत्व का आवश्यक स्थान है। इसके दो स्थायी समस्थानिक, द्रव्यमान संख्या 14, 15 ज्ञात हैं तथा तीन अस्थायी समस्थानिक (द्रव्यमान संख्या 13, 16, 17) भी बनाए गए हैं।

नाइट्रोजन तत्व की पहचान सर्वप्रथम 1772 ई. में रदरफोर्ड और शेले ने स्वतंत्र रूप से की। शेले ने उसी वर्ष यह स्थापित किया कि वायु में मुख्यत: दो गैसें उपस्थित हैं, जिसमें एक सक्रिय तथा दूसरी निष्क्रिय है। तभी प्रसिद्ध फ्रांसीसी वैज्ञानिक लाव्वाज़्ये ने नाइट्रोजन गैस को ऑक्सीजन (सक्रिय अंश) से अलग कर इसका नाम 'ऐजोट' रखा। 1790 में शाप्टाल (Chaptal) ने इसे नाइट्रोजन नाम दिया।

खेती में ज्यादा खर्चा और उपज के मूल्य (मुख्यत: अनाज) में कमी-यही कारण है कि अधिक फसल होने के बाद भी किसान का आर्थिक लाभ नहीं बढ़ा है। इसके विपरीत रासायनिक खाद, कीटनाशक एवं संकरित बीज की खातिर लिया गया कर्जा दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है जो किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर कर रहा है। साथ ही इनके उपयोग से भूमि की सजीवता की हत्या हो रही है।

इस कर्जे से मुक्ति का एक ही उपाय है। किसान बाजार आधारित रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों का कम से कम प्रयोग करे। अपने खेत अथवा परिसर में उत्पन्न होने वाले कूड़े, कचरे एवं गोबर से अच्छा खाद बनाकर एवं गोमूत्र से अच्छा कीटरोधक बनाकर उसका उपयोग फसल उत्पादन एवं फसल रक्षण के लिए करें। किसानों द्वारा गङ्ढे में बनाई गई खाद अथवा गोबर के ढेर से निकाली गई खाद पूर्णत: पकी हुई खाद न होने की वजह से प्राय: उसके अपेक्षित परिणाम फसल पर नहीं होते जिसकी वजह से उन्हें रासायनिक खाद डालने पर मजबूर होना पड़ता है। हमारे खेत में उत्पन्न होनेवाले कूड़े कचरे का उपयोग करके अच्छी खाद कैसे बनाई जाए इस पर ध्यानं दे कर भारी खर्च  से बचा जा सकता है .

मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिये एक उपजाऊ जमीन का होना सबसे जरुरी है। उपजाऊ जमीन एक जीवित जीव कि तरह है जिसे अपनी उत्पादकता बढाने के लिए निरंतर पोषण ली आवश्यकता है। कार्बनिक पदार्थों से इस प्रकार का पोषण प्राप्त किया जा सकता है।

निर्देश:

1. अपनी मिट्टी की खाद में नाइट्रोजन की ज्यादा मात्र होती है और आपकी मिट्टी के लिए एक आवश्यक पोषक तत्व है। खाद को फावड़ा और टिलर के साथ मिट्टी में मिलाना ज्यादा जरूरी है न कि खाद को उपर से डालना। आप अपने घर कि खाद का इस्तेमाल कर सकते हैं या बाजार से भी खरीद सकते हैं।

2. गाय या घोड़े कि खाद अपनी मिट्टी में इस्तेमाल करें। यह काम में अच्छी तरह से सुनिश्चित किया जा सकता है। इस खाद में नाइट्रोजन कि प्रचुर मात्रा होती है, जो पौधों में हरी पत्तियों के विकास को प्रोत्साहित करती है।

3. रोग मुक्त मिट्टी के लिए कटे हुए पत्ते भी मिटटी में मिला दें। यह ध्यान रहे की इन पत्तों में सड़ांध या कवक शामिल नहीं हो, अन्यथा यह मिटटी को ख़राब कर सकते हैं। आप एक फावड़े से इन पत्तों को मिट्टी में मिला सकते हैं। आप अपने घास काटने वाले यंत्र से भी पत्ते काट कर सकते हैं।

4. ज्यादा गीली या ज्यादा सूखी मिटटी में कार्बनिक पदार्थ मिलाने से बचें। तब तक मिटटी में कुछ नहीं मिलाएं जब तक कि वह भुरभुरी न हो जाये।

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जैविक खाद निर्माण की विधि

Mon, 10/23/2017 - 05:00

जैव उर्वरक (Organic fertilizers) उन उर्वरकों को कहते हैं जो जन्तुओं या वनस्पतियों से प्राप्त होते हैं। जैसे खाद, कम्पोस्ट, आदि

जैविक खेती जीवों के सहयोग से की जाने वाली खेती के तरीके को कहते हैं। प्रकृति ने स्वयं संचालन के लिये जीवों का विकास किया है जो प्रकृति को पुन: ऊर्जा प्रदान करने वाले जैव संयंत्र भी हैं । यही जैविक व्यवस्था खेतों में कार्य करती है । खेतों में रसायन डालने से ये जैविक व्यवस्था नष्ट होने को है तथा भूमि और जल-प्रदूषण बढ़ रहा है। खेतों में हमें उपलब्ध जैविक साधनों की मदद से खाद, कीटनाशक दवाई, चूहा नियंत्रण हेतु दवा बगैरह बनाकर उनका उपयोग करना होगा । इन तरीकों के उपयोग से हमें पैदावार भी अधिक मिलेगी एवं अनाज, फल सब्जियां भी विषमुक्त एवं उत्तम होंगी । प्रकृति की सूक्ष्म जीवाणुओं एवं जीवों का तंत्र पुन: हमारी खेती में सहयोगी कार्य कर सकेगा ।

जैविक खाद निर्माण की विधि 

अब हम खेती में इन सूक्ष्म जीवाणुओं का सहयोग लेकर खाद बनाने एवं तत्वों की पूर्ति हेतु मदद ले सकते हैं । खेतों में रसायनों से ये सूक्ष्म जीव क्षतिग्रस्त हुये हैं, अत: प्रत्येक फसल में हमें इनके कल्चर का उपयोग करना पड़ेगा, जिससे फसलों को पोषण तत्व उपलब्ध हो सकें ।

दलहनी फसलों में प्रति एकड़ 4 से 5 पैकेट राइजोबियम कल्चर डालना पड़ेगा । एक दलीय फसलों में एजेक्टोबेक्टर कल्चर इतनी ही मात्रा में डालें । साथ ही भूमि में जो फास्फोरस है, उसे घोलने हेतु पी.एस.पी. कल्चर 5 पैकेट प्रति एकड़ डालना होगा ।

इस खाद से मिट्टी की रचना में सुधार होगा, सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या भी बढ़ेगी एवं हवा का संचार बढ़ेगा, पानी सोखने एवं धारण करने की क्षमता में भी वृध्दि होगी और फसल का उत्पादन भी बढ़ेगा । फसलों एवं झाड पेड़ों के अवशेषों में वे सभी तत्व होते हैं, जिसकी उन्हें आवश्यकता होती है :-

नाडेप विधि

       नाडेप का आकार :- लम्बाई 12 फीट     चौड़ाई 5 फीट    उंचाई 3 फीट आकार का गड्डा कर लें। भरने हेतु सामग्री :-  75 प्रतिशत वनस्पति के सूखे अवशेष, 20 प्रतिशत हरी घास, गाजर घास, पुवाल, 5 प्रतिशत गोबर, 2000 लिटर पानी ।

       सभी प्रकार का कचरा छोटे-छोटे टुकड़ों में हो । गोबर को पानी से घोलकर कचरे को खूब भिगो दें । फावडे से अच्छी तरह मिला दें ।

       विधि नंबर –1 – नाडेप में कचरा 4 अंगुल भरें । इस पर मिट्टी 2 अंगुल डालें । मिट्टी को भी पानी से भिगो दें । जब पुरा नाडेप भर जाये तो उसे ढ़ालू बनाकर इस पर4 अंगुल मोटी मिट्टी से ढ़ांप दें ।

       विधि नंबर-2- कचरे के ऊपर 12 से 15 किलो रॉक फास्फेट की परत बिछाकर पानी से भिंगो दें । इसके ऊपर 1 अंगुल मोटी मिट्टी बिछाकर पानी डालें । गङ्ढा पूरा भर जाने पर 4 अंगुल मोटी मिट्टी से ढांप दें ।

       विधि नंबर-3- कचरे की परत के ऊपर 2 अंगुल मोटी नीम की पत्ती हर परत पर बिछायें। इस खाद नाडेप कम्पोस्ट में 60 दिन बाद सब्बल से डेढ़-डेढ़ फुट पर छेद कर 15 टीन पानी में 5 पैकेट पी.एस.बी एवं 5 पैकेट एजेक्टोबेक्टर कल्चर को घोलकर छेदों में भर दें । इन छेदों को मिट्टी से बंद कर दें ।

जैविक खाद तैयार करना

जैविक खाद को घर में से बनाने के कुछ उपाय निम्नलिखित हैं :

1. रसोई के कचरे से खाद बनाने की विधि :

अनिवार्य रूप से, ग्रामीणों को रसोई के कचरे की कम पैमाने पर होने वाली एरोबिक अपघटन के बारे में बताया जाता है और उसे कैसे उपयोग में लाया जाए इस के लिए प्रशिक्षित किया जाता है । इस खाद को बनाने की विधि निम्नलिखितहैं :

·    कैंटीन, होटल आदि से रसोई कचरे इकठ्ठा कर लीजिए ।

·    लगभग 1 फुट गहरा गड्ढा खोदें और एकत्रीत कचरे को उसमें भर लें।
·    इन अपशिष्ट युक्त गड्ढे में, लगभग 250 ग्राम रोगाणुओं को डाला जाता है जो अपघटन बढ़ाने का काम करते हैं ।

·    पानी और मिट्टी की एक परत को साथ मिश्रित कर के कवर द्वारा बीछा दिया जाता है ताकि नमी की मात्रा को बनाए रखा जा सके ।

·    इसे लगभग 25-30 दिनों के लिए इसी तरह के रूप में छोड़ दिया जाता है और अपशिष्ट माइक्रोबियल अमीर खाद में परिवर्तित हो जाता है ।

    इस प्रक्रिया को हर 30 से 35 दिनों के बाद दोहराया जा सकता है ।

2.    सूखी जैविक उर्वरक:

सूखी जैविक खाद ,को इन में से किसी भी एक चीज़ से बनया जा सकता है - रॉक फॉस्फेट या समुद्री घास और इन्हे कई अवयवों के साथ मिश्रित किया जा सकता है।लगभग सभी जैव उर्वरक पोषक तत्वों की एक व्यापक सारणी प्रदान करते हैं, लेकिन कुछ मिश्रणों को विशेष रूप से नाइट्रोजन, पोटेशियम, और फास्फोरस की मात्रा को संतुलित रखने के लिए और साथ ही सूक्ष्म पोषक तत्व प्रदान करने के लिए तैयार किया जाता हैं।

  वर्तमान समय में अनेक वाणिज्यिक मिश्रण उपलबद्ध हैं तथा अलग-अलग संशोधन के मिश्रण से इन्हे खुद भी बना सकते हैं।

3.    तरल जैव उर्वरक

 इस खाद को चाय के पत्तो से या समुद्री शैवाल से बनाया जा सकता है । तरल उर्वरक का प्रयोग पौधो में पोषक तत्वों को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है इसे हर महीने या हर 2 सप्ताह में पौधो पर छिड़का जा सकता है । एक बैग स्प्रेयर की टंकी में तरल जैव उर्वरक के मिश्रण को भर कर पत्ते पर स्प्रे कर सकते है । 

4.    विकास बढ़ाने वाले उर्वरको का प्रयोग

 वह उर्वरक जो कि पौधों को मिट्टी से अधिक प्रभावी ढंग से पोषक तत्वों को अवशोषित कर सकने मे मदद करते हैं।सबसे आम विकास बढ़ाने वाला उर्वरक सिवार है जो समुद्री घास की राख से बनता है । यह सदियों से किसानों के द्वारा इस्तेमाल किया गया है ।

5.    पंचगाव्यम्

  ' पंच ' शब्द का अर्थ है पांच, और 'गाव्यम्’शब्द का अर्थ है गाय से प्राप्त होने वाला तत्व ।यह उर्वरक प्राचीन काल से भारतीयों द्वारा इस्तेमाल किया जाता रहा है. इस खाद को बनाने की विधि निम्नलिखित हैं :

·         एक मटका लें।

·         उसमें गाय का दूध, दही , मक्खन, घी , मूत्र, गोबर और निविदा नारियल डाल लें ।

·         लकड़ी की छड़ी की मद्द से अच्छी तरह से मिलाएं ।

·         तीन दिनों के लिए मिश्रण युक्त बर्तन को बंद कर के रखें।

·         तीन दिनों के बाद केले और गुड़ को उसमें डाल दें ।

·         इस मिश्रण को हर रोज (21 दिनों के लिए) मिलाते रहें, और यह सुनिश्चित करें की मिश्रण को मिलाने के बाद बर्तन को अच्छे से बंद कर लें.

·         21 दिनों के बाद मिश्रण से बु उत्पन्न होने लगती है ।

·         फिर पानी के 10 लीटर के मिश्रण के 200 मिलीलीटर तैयार मिश्रण मिला लें और पौधों पर स्प्रे करें।

जैविक खाद बनाने के लिए आम घरेलू खाद्य सामग्री

·         ग्रीन चाय - हरी चाय का एक कमजोर मिश्रण पानी में मिला कर पौधों पर हर चार सप्ताह के अन्तराल पर इस्तेमाल किया जा सकता है(एक चम्मच चाय में पानी के 2 गैलनध)।

·         जिलेटिन - जिलेटिन खाद पौधों के लिए एक महान नाइट्रोजन स्रोत हो सकता है , हालांकि ऐसा नहीं हैकी सभी पौधों नाइट्रोजन के सहारे ही पनपे। इसे बनाने के लिए  गर्म पानी की 1 कप में जिलेटिन कीएक पैकेज भंग कर के मिला ले, और फिर एक महीने में एक बार इस्तेमाल के लिए ठंडे पानी के 3 कपमिला लें ।

·         मछलीघर का पानी – 

मछलीघर टैंक से  पानी बदलते समय उसका  पानी पौधों को देने के काम आ सकता है । मछली अपशिष्ट एक अच्छ उर्वरक बनाता है।

इस प्रकार के खाद सस्ते और बनाने में आसान होते हैं और साथ ही बहुत प्रभावी भी होते हैं इनके प्रयोग से मिट्टी और फसल की गुणवत्ता में काफी सुधार होता है, जिन में से कुछ निम्नलिखित हैं :

खाद, मिट्टी की संरचना में सुधार लाता है, जिसके कारण मिट्टी में हवा का प्रवाह अच्छे से संमभ्व हो पाता है , जल निकासी में सुधार होता है और साथ ही साथ पानी के कारण होने वाली मिट्टी का कटाव भी कम कर हो जाता है ।
खाद मिट्टी में पोषक तत्वों को जोड़ देता है ताकी उन्हे पौधें आसानी से सोख़ सकें और उन्हे पोषक तत्वों को लेने में आसानी हो तथा फसल की पैदावार अच्छी हो जाये।
खाद मिट्टी की जल धारण करने की क्षमता में सुधार लाता है । इस कारण सूखे के समय में भी मिट्टी मे नमी बनी रहती है।
मिट्टी में खाद मिलाने से फसल में कीट कम लगते हैं और फसल की रोगप्रतीरोधक छमता में वृद्धिहोती हैं ।
खाद, रासायनिक उर्वरकों से कई अधीक फायदेमदं हैं । रासायनिक उर्वरकों पौधों को तो लाभ पहुँचातें हैं किन्तु इनसे मिट्टी को कोई फायदा नहीं पहुँचता है । ये आम तौर पर उसी ऋतु में पैदावार बढ़ाते है जिसमें इनका छिड़काव कियाजाता हैं । क्योंकि खाद मिट्टी को पोषक तत्व प्रदान करती है और मिट्टी की संरचना में सुधार लाती है , इस वज़ह से इसकेलाभकारी प्रभाव लंबे समय तक चलते है ।

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रासायनिक खाद भूमि की बरबादी कारण

Mon, 10/23/2017 - 05:00

खरपतवार की - सनई, रिजका आदि की ऐसी हरी फसलें उगाई और जोतकर जमीन में मिलाई जा सकती हैं जो जमीन की उर्वरा शक्ति की रक्षा करती रह सकें। पशु-धन नष्ट न किया जाय और उसके गोबर को उपले आदि बनाकर नष्ट करने की अपेक्षा यदि खाद्य के रूप में ही उसे पुनः वापिस कर दिया जाय तो यह प्रश्न उत्पन्न ही न होगा कि जमीन कमजोर हो गई और उसकी पैदावार घट गई।

इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि जिस प्रकार आहार-विहार को सुसंयत रखकर स्वास्थ्य रक्षा के सीधे उपाय को छोड़कर लोगों की समझ में यह आ गया है कि अप्राकृतिक और उच्छृंखल जीवन-क्रम बनाकर मनमानी की जाय और उसके दुष्प्रभाव से बचने के लिये दवाओं की शरण ली जाय। उसी प्रकार भूमि के बारे में भी यही नीति अपनाई गई है। उसे खरपतवार और गोबर की खाद से वंचित किया जा रहा है। पशु धन घटता चला जा रहा है और उसके गोबर का दूसरा उपयोग हो रहा है। जो घास-पात खेत से ली जाती है वह प्रकारान्तर से उसे वापिस नहीं मिलती। ऐसी दशा में जमीन यदि कम उपज देने लगे तो यह स्वाभाविक ही है।

इस कमी की पूर्ति के लिये आज ही सभ्यताभिमानी उद्धत बुद्धि कोई जल्दी पहुँचने वाली पगडंडी ढूँढ़ती है। दवाओं के आधार पर स्वास्थ्य संरक्षण एवं रोग निवारण की जो सनक कार्यान्वित हो रही है वही तरीका भूमि के लिए भी अपनाया जा रहा है। रासायनिक खादों से भूमि को उत्तेजित करके उससे अधिक कमाई करने की रीति-नीति अपनाई जा रही है। सोचा जा रहा है इस तरह अधिक पैदावार का लाभ उठाया जा सकेगा। पर यह आशा अन्ततः दुराशा मात्र ही सिद्ध होगी। तथाकथित स्वास्थ्य बढ़ाने वाली दवाओं की भरमार से बाजार भरा पड़ा है। लोग उन्हें खरीदते और खाते भी बहुत हैं पर देखा जाता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य दिन-दिन गिरता ही जाता है और औषधि खाद्य खाने वाले अपेक्षाकृत और भी अधिक दुर्बल होते चले जाते हैं। रोगों के निवारण करने के लिए जितनी तीक्ष्ण, तीव्र, उत्तेजक और विघातक औषधियाँ बनी हैं उसी अनुपात से रोग वृद्धि का सिलसिला भी अग्रगामी ही होता चला जा रहा है। यही प्रयोग अब जमीन के शरीर पर भी किया जा रहा है। आशायें बहुत दिलाई जा रही हैं और कहा जा रहा है कि रासायनिक खाद हमारी भूमि को अधिक उत्पादन दिला सकने में समर्थ होंगे। आरम्भ में ऐसा होता भी है। नशा पीकर बलवान बने फिरने वाले शराबी की तरह कुछ दिनों तक यह प्रयोग लाभदायक दीखता है, पर अन्ततः जिस प्रकार नशा उतरने पर शराबी पहले से भी अधिक अशक्त हो जाता है। वही हाल इस अन्धाधुन्ध रासायनिक खादों के प्रयोग का भी होने वाला है। हो भी रहा है।

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माह वार करें सब्जियों की खेती

Sun, 10/22/2017 - 05:10

संबंधित महीनों में उगाई जाने वाली सब्जियों का विवरण निम्‍नानुसार है :
माह फसलें
जनवरी
राजमा, शिमला मिर्च, मूली, पालक, बैंगन, चप्‍पन कद्दू
फरवरी
राजमा, शिमला मिर्च, खीरा-ककड़ी, लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, खरबूजा, तरबूज, पालक, फूलगोभी, बैंगन, भिण्‍डी, अरबी, एस्‍पेरेगस, ग्‍वार
मार्च
ग्‍वार, खीरा-ककड़ी, लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, खरबूजा, तरबूज, पालक, भिण्‍डी, अरबी
अप्रैल
चौलाई, मूली
मई 
फूलगोभी, बैंगन, प्‍याज, मूली, मिर्च
जून 
फूलगोभी, खीरा-ककड़ी, लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, बीन, भिण्‍डी, टमाटर, प्‍याज, चौलाई, शरीफा
जुलाई
खीरा-ककड़ी-लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, भिण्‍डी, टमाटर, चौलाई, मूली
अगस्‍त
गाजर, शलगम, फूलगोभी, बीन, टमाटर, काली सरसों के बीज, पालक, धनिया, ब्रसल्‍स स्‍प्राउट, चौलाई
सितम्‍बर
गाजर, शलगम, फूलगोभी, आलू, टमाटर, काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्‍ता गोभी, कोहीराबी, धनिया, सौंफ के बीज, सलाद, ब्रोकोली
अक्‍तूबर
गाजर, शलगम, फूलगोभी, आलू, टमाटर, काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्‍ता गोभी, कोहीराबी, धनिया, सौंफ के बीज, राजमा, मटर, ब्रोकोली, सलाद, बैंगन, हरी प्‍याज, ब्रसल्‍स स्‍प्राउट, लहसुन
नवम्‍बर
चुकन्‍दर, शलगम, फूलगोभी, टमाटर, काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्‍ता गोभी, शिमला मिर्च, लहसुन, प्‍याज, मटर, धनिया
दिसम्‍बर
टमाटर, काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्‍ता गोभी, सलाद, बैंगन, प्‍याज

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मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यों और कैसे ?

Sat, 10/21/2017 - 05:00

मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यों और कैसे ? क्यूंकि ,मुर्गीपालन भूमिहीन ,सीमान्त किसानों तथा बेरोजगार नौजवानों को स्वरोजगार उपलब्ध कराने का एक प्रभावी साधन है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गीपालन लगातार ८-१० प्रतिशत वार्षिक वृद्धि की दर से बढ़ रहा है जबकि दूध व्यवसाय की वार्षिक वृद्धि दर ४-५ प्रतिशत अनुमानित है । कुछ प्रबुद्ध शाकाहारियों द्वारा अनिषेचित अंडे को शाकाहार के रूप में स्वीकार किये जाने से अंडे की माँग में राष्ट्रीय स्तर पर वृद्धि हुई है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि इस व्यवसाय में कम कीमत पर अधिक खाद्य पदार्थ प्राप्त होता है । उदाहरण के रूप में ब्रायलर मुर्गे का एक किग्रा शरीर भार २ किग्रा दाना मिश्रण खिला कर प्राप्त किया जा सकता है । इसी प्रकार मुर्गी से एक दर्जन अंडे पाने के लिये उसे सिर्फ़ २.२ किग्रा दाना मिश्रण ही खिलाना जरूरी होता है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गी की खाद्य परिवर्तन क्षमता गाय और सूअर की तुलना में भी बहुत बेहतर होती है । गाय एक किग्रा खाद्य पदार्थ उत्पादन के लिये ५ किग्रा दाना मिश्रण तथा सूअर एक किग्रा मांस उत्पादन के लिये ३ किग्रा दाना मिश्रण का उपयोग करता है जबकि मुर्गी सिर्फ़ दो किग्रा दाना खा कर एक किग्रा शरीर भार पा लेती है ।

मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गी के माँस के विक्रय में किसी भी प्रकार की धार्मिक मान्यता बाधक नहीं बनती है. साथ ही साथ मुर्गी के माँस तथा अंडे के लिये अपने प्रदेश तथा पूरे देश में भलीभाँति विकसित बाजार मौजूद है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गी की बीट तथा बिछावन से बनाई गयी खाद में , गाय के गोबर की खाद की तुलना में अधिक मात्रा में नत्रजन, फास्फोरस तथा पोटाश पाया जाने के कारण इसकी कार्बनिक खेती के लिये बहुत माँग रहती है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गी की सुखाई हुई बीट को निर्जमीकृत करने के बाद पशु आहार बंनाने में भी प्रयोग किया जाता है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गी के अंडे के अंड पीत को वीर्य तानुकारक बनाने में भी प्रयोग किया जाता है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गी का व्यवसाय एक ऐसा अनूठा धंधा है जिसमें बहुत ही जल्दी आपकी पूँजी बढोत्तरी के साथ आपको वापस मिल जाती है । ब्रायलर मुर्गे से सिर्फ़ ४ सप्ताह में आप एक किग्रा वजन पा सकते हैं ।

इसी प्रकार मुर्गी से अंडा उत्पादन प्राप्त करने के लिये लगभग ४.५ महीने का समय पर्याप्त होता है ।इस प्रकार पूँजी को लाभ सहित वापस पाने के बाद उसे फिर से इस व्यवसाय में लगाने से अगली बार और अधिक पूंजीगत लाभ की प्राप्ति सम्भव हो पाती है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गीपालन में तुलनात्मक रूप से कम पूँजी, कम स्थान तथा कम श्रम शक्ति की जरूरत पडती है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गी के व्यवसाय से सारे साल नियमित रूप से आय प्राप्ति सम्भव है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गी पालन के धंधे का विस्तार भी बहुत आसान है क्योंकि एक अच्छी नस्ल की उन्नत मुर्गी साल भार में २५० से अधिक निषेचित अंडे देने की क्षमता रखती है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि यदि वैज्ञानिक तरीके अपनाते हुए तथा नियमित रूप से टीकाकरण करने के साथ मुर्गीपालन किया जाये तो इस व्यवसाय में जोखिम भी बहुत कम रहता है । मुर्गीपालन लाभकारी व्यवसाय क्यूंकि मुर्गीपालन को स्वरोजगार के रूप में बेरोजगार नौजवान, गृहणी तथा सेवानिवृत्त कर्मचारी, भी सहजता से अपना कर एक अतिरिक्त आय का स्रोत बना सकते हैं ।

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ग्रीन हाउस किसानो के लिए वरदान

Thu, 10/19/2017 - 07:09

ग्रीन हाउस के माध्यम से किसान कम लागत में अपने सपनों को नई उडान दे सकते है | ग्रीन हाउस कि तकनीक काफी किफायती है | कम जगह में अच्छी फसल देना इसकी खूबी है | ग्रीन हाउस में बहुत अधिक गर्मी है या सर्दी से फसलों कि रक्षा करते है,धुल और बर्फ के तूफानों से पौधों कि ढाल बनते है और किटों को बाहर रखने में मदद करते है,प्रकाश और तापमान नियंत्रण कि वजह से ग्रीन हाउस कृषि के अयोग्य भूमि को कृषि योग्य भूमि में बदल देता है | यह तकनीक पौधों को प्रतिकूल दशाओं के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करती है | कृषि से सम्बन्ध रखने वाले युवा जो पहले खेती करना छोड़कर नौकरी के लिए शहर कि तरफ जाने लगे थे | वो अब ग्रीन हाउस कि नई तकनीकें सीखकर गांव को लौट रहे है | ग्रीन हाउस में डच गुलाब,जरबेरा कारनेशन गुलदावदी रंगीन शिमला मिर्च,चेरी,टमाटर एफ-1 हाईब्रिड टमाटर कि खेती कर सकते है | ग्रीन हाउस लोहे के पाइपों या लकड़ी से बना एक ऐसा ढाचा है जो एक पारदर्शी आवरण से ढंका होता है | इसमे से सूर्य कि किरणे जो पौधों के लिए उपयुक्त पाई जाती है , अंदर आ सकती है | विशेष तौर से 400-700 नैनोमीटर वेवलेंथ वाली किरणे जिसको कि हम विजिबल लाईट कहते है | पौधों कि प्रकाश संश्लेषण क्रिया के लिए उपयुक्त होती है | अगर यह पारदर्शी ढंकने कि सामग्री पोलीथीन फिल्म या शीट काम में ली जाती है तो इसे पोलीहाउस कहते है | पोलिहाऊस में कटफ्लावर कि खेती (डच गुलाब ,जरबेरा कारनेशन,गुलदावदी और रंगीन शिमला मिर्च) कि खेती कि जाती है | अगर यह पारदर्शी ढकने कि सामग्री शेड नेट कि जाली है तो उसे शेडनेट हाउस कहा जाता है |शेडनेट हाउस में रंगीन शिमला मिर्च चेरी,टमाटर जुकनी ब्रोकली लेट्यूस लाल गोभी हरा धनिया और सब्जियों के पौध ,फलों के पौधे एवं जंगली पौधों कि नर्सरी तैयार करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है | अगर यह पारदर्शी ढकने कि सामग्री में ग्लास है तो उसे ग्लास हाउस कहते है | एक अच्छे ग्रीन हाउस के लिए 4000 वर्ग मीटर कि जगह पर्याप्त है क्योकिं ऐसे ग्रीन हाउस में हवा का प्रवाह ठीक रहता है | तापमान आर्दता आदि को नियंत्रित करना आसान होता है ,उत्पाद व गुणवत्ता कि मात्रा भी अच्छी होती है | पोलीहाउस लगाने पर 935 रु. वर्ग मीटर का खर्चा आता है जबकि छाया गृह लगाने पर 270 रु.वर्ग मीटर का खर्च आता है | ग्रीन हाउस से कि जाने वाली खेती ,खेती नहीं बल्कि एक उद्योग है | इसी वजह से युवा वर्ग इसे स्वरोजगार के रूप में अपनाकर अच्छा मुनाफा कमा रहे है | एक ग्रीन हाउस से सामान्यत: 10 से  15 हजार रुपये तक आसानी से कमा सकते है | नीदरलैंड से ले प्रेरणा – नीदरलैंड में 9000 के आस – पास ग्रीनहाउस 10,000 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन प् लगे हुए है जिससे लगभग 150,000 श्रमिकों को रोजगार मिला हुआ है जो श्रमिकों को रोजगार मिला हुआ है जो कुशलतापूर्वक 4.5 अरब यूरो कीमत की सब्जियां फल,पौधे और फूल उगा रहे है जिसमे से 80 प्रतिशत हिस्से का निर्यात किया जाता है | कहां से ले प्रशिक्षण ? 1.       इन्टरनेशनल होर्टिकल्चर इनोवेशन एण्ड ट्रेनिंग सेन्टर दुर्गापुरा ,जयपुर(राजस्थान) 2.       हार्टिकल्चर ट्रेनिंग सेन्टर,तालेगांव दाभाडे पूना(महाराष्ट्र) 3.       इंटरनेशनल इंस्टीटयूट ऑफ हार्टिकल्चर टेक्नोलॉजी नोएडा (यू.पी.) 4.       इण्डियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट नई दिल्ली 5.       सेन्ट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ टेम्परेट हार्टिकल्चर श्री नगर,(जे एण्ड के ) 6.       डॉ.यशवन्त परमार हार्टिकल्चर युनिवर्सिटी सोलन(हिमालय प्रदेश) 7.       इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ 

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उपजाऊ मिट्टी नासमझी और मनमानी से बन रही जहर

Wed, 10/18/2017 - 05:09

इटारसी। सोना उगलने वाले होशंगाबाद जिले की उपजाऊ मिट्टी किसानों की नासमझी और मनमानी की वजह से जहर में तब्दील होती जा रही है। बंपर पैदावार के मामले में पंजाब जैसे कृषि प्रधान प्रदेश को पीछे छोड़ने वाले जिले में कीटनाशक दवाओं के अंधाधुध प्रयोग से मिट्टी में मौजूद आर्गेनिक तत्वों का असंतुलन बढ़ता जा रहा है। इससे जहां पैदावार प्रभावित हो रही है वहीं रासायनिक तत्वों से पैदा अनाज के सेवन से मानव शरीर को नुकसान पहुंचने का खतरा भी बढ़ रहा है। निकट भविष्य में रासायनिक खेती के गंभीर दुष्परिणाम किसानों को भुगतना पड़ सकते हैं।

किसानों को नहीं परवाह

अधिकतम उत्पादन और जल्दी फसल तैयार करने के लालच में किसानों ने अंधाधुध तरीके से कीटनाशक दवाएं खेतों में डालना शुरू किया है। इससे तात्कालिक लाभ तो मिल रहा है लेकिन खेतों की मिट्टी में अम्लीयता बढ़ रही है। इससे निकट भविष्य में न केवल उत्पादन प्रभावित होगा, बल्कि उत्पादित अनाज के सेवन से मानव शरीर को भी नुकसान होने की आशंका है। कीटनाशकों के मामले में जिले के किसान वैज्ञानिकों की सलाह लिए बिना मनमर्जी से इसका उपयोग कर रहे हैं। पोषक एवं उर्वरक तत्वों की कमी होने के कारण किसानों ने अपने खेतों को जहरीला बना लिया है।

मृदा परीक्षण की चिंता नहीं

किसानों की सुविधा के लिए कृषि विभाग द्वारा पवारखेड़ा में मृदा परीक्षण प्रयोगशाला संचालित की जा रही है। जहां मात्र पांच रूपए में खेतों की मिट्टी का सैंपल लेकर जांच की जाती है, लेकिन हजारों एकड़ रकबे वाले जिले में सालाना लगभग दस हजार किसान ही मृदा परीक्षण के लिए आते हैं। वैज्ञानिकों के बुलावे के बाद भी किसान इसमें रूचि नहीं ले रहे हैं। केन्द्र से किसानों को कई महत्वपूर्ण जानकारियां भी निशुल्क दी जाती हैं।

पंजाब भुगत रहा नुकसान

दो दशक पहले तक पंजाब-हरियाणा की उपजाऊ जमीन भी कीटनाशक दवाओं के बेतहाशा उपयोग का खामियाजा भुगत रही है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार अब हालात यह हैं कि पंजाब की जमीन धीरे-धीरे बंजर हो गई है। यहां तेजी से उत्पादन क्षमता में गिरावट आई है।

जैविक कृषि से परहेज

एक दौर में जैविक तत्वों, गोबर गैस एवं घरेलू उपायों से खेती करने वाले किसान अब जैविक खेती से परहेज करने लगे हैं। कृषि क्षेत्र में बढ़ी प्रतिस्पर्धा इसका बड़ा कारण है। प्राचीन भारत की कृषि पद्घति ऋ षि खेती भी किसान भूल चुके हैं। जिसमें पूरी तरह जैविक पदार्थो का उपयोग किया जाता रहा।

अंतर्राष्ट्रीय मानकों की अनदेखी

वैज्ञानिकों के अनुसार कीटनाशक दवाओं के उपयोग को लेकर अंतर्राष्ट्रीय मानक निर्धारित किए गए हैं। इसके मुताबिक ही कीटनाशक दवाओं का छिड़काव होना चाहिए लेकिन नियमों के विपरीत कीटनाशकों के उपयोग से मिट्टी में मौजूद प्राकृतिक केंचुए, कीट-पतंगे एवं आर्गेनिक नष्ट हो रहे हैं।

क्या है मिट्टी का फार्मूला

बेहतर एवं संतुलित कृषि उत्पादन के लिए आदर्श मिट्टी में पीएच-7 का फार्मूला अपनाया जाता है। इसमें सभी जरूरी तत्वों का संतुलन शामिल है। इससे कम या ज्यादा की मिट्टी आदर्श नहीं मानी जाती। जिले में हो रहे परीक्षण में पता चला है कि अधिकांश खेतों की मिट्टी पीएच-7 के अनुरूप नहीं है। मिट्टी में जरूरी तत्वों की कमी के अलावा अम्ल की मात्रा बढ़ रही है। मिट्टी में कुल सोलह जरूरी तत्व होते हैं।

जैविक

इन तत्वों का अंसतुलन

जांच रिपोर्ट के अनुसार खेतों की मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी आ रही है। आदर्श तौर पर यह मात्रा 180-200 प्रति किलो-हेक्टेयर होना चाहिए। इसके अलावा मिट्टी में जिंक की कमी भी आ रही है। धान के लिए जिंक संतुलन जरूरी है। इसकी कमी से धान के पौधे में चकते पड़ने लगे हैं। फॉस्फोरस भी मध्यम स्तर पर आ गया है। इसके अलावा पोटेशियम, कॉपर, मोलीविडेनम, सोडियम, मैग्नीज, आयरन भी तेजी से बढ़ रहा है। पोटेशियम(220ः300) से बढ़कर 500 की सीमा लांघ चुका है।

ये है नुकसान

पोटेशियम की बढ़त- दाने की चमक खत्म, फसल में रोग प्रतिरोधकता की कमी।

जिंक की कमी- पौधों का बीमार होकर पैदावार पर असर।

नाइट्रोजन की कमी- आर्गेनिक तत्वों की कमी से उत्पादन एवं फसल प्रभावित।

फॉस्फोरस की कमी- जड़ों का विकास रूकना।

चिंताजनक है स्थिति

कीटनाशक दवाओं का मनमर्जी से उपयोग करने की वजह से मिट्टी में पाए जाने वाले आर्गेनिक तत्वों को नुकसान हो रहा है। इससे फसलों के उत्पादन पर असर पड़ रहा है। संभाग के किसान मृदा परीक्षण में भी रूचि नहीं लेते हैं। कई हानिकारक तत्वों की मात्रा बढ़ने से खेत जहरीले होते जा रहे हैं। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। निकट भविष्य में किसानों को इसके गंभीर परिणाम भुगतना पड़ सकते हैं।

जीएस बेले, सहायक मृदा परीक्षण अधिकारी

मृदा परीक्षण केन्द्र पवारखेड़ा।

फसलों में उपयोग होने वाले रासायनिक तत्व अनाज के जरिए शरीर में प्रवेश करते हैं। इससे हार्टअटैक, त्वचा संबंधी रोग, रक्तचाप, शुगर सहित अन्य घातक बीमारियां हो सकती हैं। तेजी से बढ़ रही बीमारियों का एक बड़ा कारण यह भी है।

डॉ. केएल जैसवानी, वरिष्ठ चिकित्सक।

जागरूकता अभियान चलाएंगे

रासायनिक खेती की जगह किसानों को जैविक कृषि करने के लिए जागरूक किया जा रहा है। इसके लिए वर्मी कंपोस्ट, नाडेप, बॉयोगैस प्लांट के साथ नीम का तेल, बेश्रम, तंबाखू की पत्तियों को निचोड़कर खेतों में छिड़काव करने की सलाह दी जा रही है। जिसे पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे।

पीके विश्वकर्मा, संयुक्त संचालक कृषि विभाग। 

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